उत्तराखंडी फिल्म 'ढोली' ने 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत रचा इतिहास
उत्तराखंडी फीचर फिल्म 'ढोली' ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया है। यह पहली बार है जब किसी उत्तराखंडी बोली भाषा की फुल लेंथ फीचर फिल्म को यह सम्मान मिला है। फिल्म का निर्देशन दिनेश पी. भोंसले ने किया है और यह उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर हटवाल की कहानी पर आधारित है।
देहरादून। उत्तराखंडी फीचर फिल्म 'ढोली' ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया है। पहली बार किसी उत्तराखंडी बोली भाषा की फुल लेंथ फीचर फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा हुई है। बेस्ट उत्तराखंडी फिल्म के लिए निर्माता और निर्देशक को रजत कमल और दो लाख रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। शनिवार को नई दिल्ली में 72वें नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड्स के विजेताओं की घोषणा की गई। इन अवॉर्ड्स की घोषणा फीचर फिल्म जूरी के चेयरपर्सन जयराज, नॉन-फीचर फिल्म जूरी के चेयरपर्सन असीम सिन्हा और सिनेमा पर लेखन जूरी के चेयरपर्सन ए. चंद्रशेखर ने दिल्ली में की।
उत्तराखंडी फिल्म की खुशियां
उत्तराखंडी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा से उत्तराखंड के सिने प्रेमियों में खुशी की लहर है। फिल्म का निर्देशन दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके कोंकणी फिल्म निर्देशक दिनेश पी. भोंसले ने किया है। वह प्रसिद्ध फिल्म संपादक वामन भोंसले के भतीजे हैं। इससे पहले उनकी कोंकणी फिल्मों 'अमोरी' और 'एनिमी' को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। 'ढोली' उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार-संस्कृति कर्मी डॉ. नंदकिशोर हटवाल की चर्चित कहानी 'जमनदास ढोली' पर आधारित है। फिल्म की शूटिंग वर्ष 2023 में उत्तरकाशी जिले की असीगंगा घाटी के नाल्ड गांव और आसपास के क्षेत्रों में हुई थी। इससे पहले वर्ष 2023 में 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उत्तराखंड को गैर-फीचर श्रेणी में गढ़वाली-हिंदी डॉक्यूमेंट्री 'एक था गांव' को सर्वश्रेष्ठ नॉन-फीचर फिल्म तथा 'पाताल ती' के लिए बिट्टू रावत को सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफर का पुरस्कार मिला था। अब 'ढोली' ने गढ़वाली फीचर सिनेमा को राष्ट्रीय पहचान दिलाकर नया अध्याय जोड़ दिया है।
फिल्म का सामाजिक संदेश
'ढोली' ने पर्दे पर उतारा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और उपेक्षित समाज का दर्द : 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित गढ़वाली फीचर फिल्म 'ढोली' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज है। फिल्म की कहानी प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर हटवाल की चर्चित रचना 'जमनदास ढोली' पर आधारित है, जिसमें उस समुदाय की पीड़ा को सामने लाया गया है जिसे उत्तराखंड में ढोली, बाजगी, औजी और दास जैसे नामों से जाना जाता है।
ढोली समुदाय का इतिहास
ढोली समुदाय सदियों से देवपरंपरा, लोकसंगीत और सांस्कृतिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा रहा है। मंदिरों, मांगलिक कार्यों, कौथिगों और धार्मिक अनुष्ठानों में ढोल-दमाऊं के बिना परंपराएं अधूरी मानी जाती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज ने संस्कृति को जीवित रखा, वही सामाजिक उपेक्षा और भेदभाव का शिकार रहा। फिल्म इसी विरोधाभास को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। फिल्म का निर्देशन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक दिनेश पी. भोंसले ने किया है, जबकि संगीत उत्तराखंड के लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने दिया है। फिल्म में मोहित घिल्डियाल, दीपा देऊपा, रमेश नौडियाल, सतीश धौलाखंडी, सोनिया गैरोला सहित अनेक स्थानीय कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय किया है। उत्तरकाशी की असीगंगा घाटी के प्राकृतिक परिवेश में फिल्माई गई यह फिल्म अपनी प्रामाणिकता और स्थानीय रंग के कारण अलग पहचान बनाती है। 'ढोली' सामाजिक समानता, सम्मान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रभावशाली संदेश देती है। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के साथ यह फिल्म गढ़वाली सिनेमा के लिए नई संभावनाओं का द्वार खोलने वाली उपलब्धि बन गई है और क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई है। उत्तराखंडी फिल्मों के वरिष्ठ अभिनेता बलराज नेगी ने इसे उत्तराखंड आंचलिक फिल्म जगत की उपलब्धि करार दिया है। फिल्म के कार्यकारी निर्माता शिशिर कृष्ण शर्मा ने बताया कि ढोली फिल्म को देहरादून और कोलकाता में पिछले वर्ष फिल्म समारोहों में दिखाया गया था। जल्द ही इसे सिनेमा हॉलों में प्रदर्शित किया जाएगा।
पिछला पुरस्कार
ढोली से पहले ‘एक था गांव’ को मिला था 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: वर्ष 2023 में गढ़वाली और हिंदी में बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'एक था गांव' को 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ नॉन-फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला है। इस फिल्म का निर्देशन टिहरी जिले की रहने वाली सृष्टि लखेड़ा ने किया था। यह शॉर्ट फिल्म पहाड़ों से हो रहे पलायन के दर्द पर आधारित थी। इसके अलावा, नॉन फीचर फिल्म केटेगरी में पाताल पी के लिए बिट्टू रावत को सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफर का पुरस्कार मिला था।
ढोली समुदाय की पहचान
कौन हैं ढोली: ‘ढोली’ उत्तराखंड की संस्कृति की ध्वजवाहक कौम है। जिसे बाजगी, औजी, दास जैसे नामों से जाना जाता है। समाजिक संरचना में ढोलियों को सबसे निचले पायदान पर रख दिया गया है। संस्कृति के ध्वजवाहकों की ये स्थिति ‘ढोली’ के बहाने एक नई बहस को जन्म देती है। समाज के जिस तबके को सबसे मजबूत किए जाने की जरुरत थी, उसे हमने लगभग उपेक्षित रखा है। जहां ढोल की तो पूजा होती है लेकिन ‘ढोली’ की नहीं। मठ-मंदिर, थान, कौथिग, मांगल कारज, विवाह, सिद्धपीठ, धामों में जहां बिना ढोल-दमाऊं के देवता भी जागृत नहीं होते। जिस ढोल को मंडाण, हिलजात्राओं में सबसे आगे रखा जाता है। उसे हमने अपनी विकास यात्रा में इतना पीछे छोड़ दिया है।
फिल्म की टीम
ढोली की टीम - निर्माता:- सुनील नायक, एस.सी. फार्माकैम प्रा.लि. (मुंबई), पटकथा और निर्देशन :- दिनेश भोंसले,कथा विस्तार, हिन्दी संवाद और कार्यकारी निर्माता :- शिशिर कृष्ण शर्मा, मूलकथा, हिन्दी से गढ़वाली में संवादों का अनुवाद :- डॉ. नंदकिशोर हटवाल, कैमरा :- अभिनव गन्धर्व (डी.ओ.पी.) और शेख़ काईज़र (असोसिएट डी.ओ.पी.), संगीत :- नरेंद्रसिंह नेगी, संपादन और सह-निर्देशक :- वीरेन्द्र घरसे, कला निर्देशक :- अतुल विश्नोई, कॉस्टयूम :- गायत्री टम्टा, मेकअप :- पूजा भंडारी, निर्माण प्रबंधन :- राजेश कारेकर, कलाकार :- मोहित घिल्डियाल, दीपा देऊपा, रमेश नौडियाल, सतीश धौलाखंडी, सोनिया गैरोला, नीरज नेगी, अतुल रावत, सुशील पुरोहित, धीरज रावत, जसपाल राणा, आनंद राणा, संजय बडोनी, सुनील सिंह, तन्मय लोहानी, मास्टर ऋषभ, अनिल जखमोला, तनुज शर्मा, प्रेम हिंदवाल, पंकज डंगवाल और उत्तरकाशी के कलाकार हैं।
उत्तराखंडी फिल्म उद्योग का इतिहास
उत्तराखंडी फिल्मों का इतिहास : उत्तराखंड फिल्म इंडस्ट्री में अब तक 150 से अधिक छोटी-बड़ी फीचर फिल्में (गढ़वाली और कुमाऊनी) बन चुकी हैं। हाल के वर्षों में हर साल औसतन 12 से 15 फिल्में बनकर रिलीज़ हो रही हैं। उत्तराखंडी सिनेमा की आधिकारिक शुरुआत 4 मई 1983 को बनी पहली गढ़वाली फिल्म 'जग्वाल' से हुई, जिसके निर्माता-निर्देशक पराशर गौड़ थे। जो पलायन और पहाड़ के संघर्षों पर आधारित थी। इस फिल्म को इतनी सफलता मिली थी कि दिल्ली में हाउसफुल शो के दौरान टिकट तक ब्लैक हुए थे।


