यूपी के जज ने चार महीनों में 22 लोगों को सुनाई मौत की सजा
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मुजफ्फरनगर, वरिष्ठ संवाददाता/एजेंसी। पिछले चार महीनों में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने 10 मामलों में 22 लोगों को मौत की सजा दी है। वहीं, पिछले वर्ष दिल्ली में एक भी दोषी को फांसी की सजा नहीं सुनाई गई। यूपी की अदालत में लगातार फांसी की सजा सुनाए जाने का यह सिलसिला 6 अप्रैल 2026 को शुरू हुआ। जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) कुलदीप कुमार के मुताबिक, कोर्ट ने सबसे पहले चर्चित वकील समीर सफी की हत्या के मामले में फैसला सुनाते हुए तीन दोषियों को मौत की सजा दी थी। इसके बाद से जज रवि कुमार दिवाकर की कोर्ट ने गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में तेजी से सुनवाई की और एक के बाद एक कड़े फैसले दिए।
इन मामलों में मिली सजा
कुलदीप कुमार ने बताया कि इन अपराधों में एक वकील की हत्या, एक होम गार्ड की हत्या, हाईवे पर लूटपाट और हत्या के अन्य मामले शामिल थे। उन्होंने कहा कि 12 अगस्त को अदालत ने लगभग 27 साल पहले फिरौती के लिए लकड़ी के व्यापारी के अपहरण और हत्या के मामले में एक व्यक्ति को मौत की सजा सुनाई। दोषी शाहनवाज पर 1999 में सलीम के अपहरण और हत्या का दोषी पाए जाने के बाद 1.10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। उन्होंने कहा कि 13 अगस्त को 12 साल पुराने हत्या के मामले में चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई।
सुरक्षा को लेकर चिंता जताई
ज्ञानवापी प्रकरण की सुनवाई कर चुके जज रवि कुमार दिवाकर ने अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने पुलिस महानिदेशक को पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि उनकी सुरक्षा में तैनात गनर को बिना उनकी सहमति और सूचना के बदल दिया गया। इसे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिहाज से गंभीर मामला बताते हुए उन्होंने आवश्यक कार्रवाई की मांग की है। न्यायिक अधिकारी ने सवाल उठाया कि सामान्यतः किसी अधिकारी के गनर को उसकी सहमति के बिना नहीं हटाया जाता। उन्होंने डीजीपी को भेजे पत्र में कहा है कि गनर को बदलने के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई है। उन्होंने इसे जानबूझकर सुरक्षा में लापरवाही किए जाने की आशंका से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी स्थिति के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इन मामलों में मिली मौत की सजा
6 अप्रैल-अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड
इस मामले में सिंगोल अल्वी, सोनू उर्फ रिजवान और शालू उर्फ अरबाज को मौत की सजा सुनाई गई
28 अप्रैल- शेखर हत्याकांड
मुकेश और उसके तीन बेटों प्रदीप, संदीप और सोनू को हत्या के मामले में फांसी की सजा दी गई
30 मई- राजेश देवी-हिमांशु हत्याकांड
इस मामले में रईस को मौत की सजा सुनाई गई
20 जून- राजेंद्र सैनी हत्याकांड
रामकरण उर्फ सावन गिरी और गजेंद्र को मौत की सजा सुनाई गई।
02 जुलाई- होमगार्ड रतिराम हत्याकांड
ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में दीपक को मृत्युदंड दिया गया
06 जुलाई- राजबीर सिंह हत्याकांड
इस मामले में पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और सहदेव उर्फ पप्पू को फांसी की सजा सुनाई गई।
17 जुलाई- किसान राजसिंह की लूट के बाद हत्या
अजित, सूरज उर्फ काला, अनिल और सुनील को मौत की सजा दी गई
12 अगस्त- सलिम हत्याकांड
करीब 27 साल पुराने अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को मौत की सजा सुनाई गई
13 अगस्त- पवन कुमार हत्याकांड
इस मामले में रामवीर, राजीव उर्फ छोटू, राहुल उर्फ बोसी और हरेंद्र कुमार को मौत की सजा सुनाई गई
दस वर्षों में 1310 लोगों को मौत की सजा
हैदराबाद स्थित हिमालयन नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्क्वायर सर्किल क्लीनिक की रिपोर्ट ने भारत में मृत्युदंड देने की न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। 10 साल के आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि ट्रायल कोर्ट लेवल पर बड़ी संख्या में फांसी की सजा सुनाई गई है, लेकिन ऊपरी अदालत में इन फैसलों का टिकना बहुत कम रहा है। आंकड़ों के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच ट्रायल कोर्ट ने कुल 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई। जब ये मामले हाई कोर्ट पहुंचें तो सिर्फ 70 मामलों में ही फांसी की सजा को बरकरार रखा गया। यह संख्या कुल सजा के मुकाबले बहुत कम मानी गई है। हाई कोर्ट की ओर से पुष्टि किए गए 70 मामलों में से सुप्रीम कोर्ट ने केवल 38 मामलों पर ही फैसला सुनाया है। इनमें से एक भी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड को बरकरार नहीं रखा।


