यूपी मॉडल ने तोड़ी थी नकल माफिया की कमर: डॉ. दिनेश शर्मा
उत्तर प्रदेश के परीक्षा सुधार मॉडल ने 2017 से 2022 के बीच पेपर लीक और नकल के खतरे को कम करने में मदद की। शिक्षा मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के नेतृत्व में की गई सख्त नीतियों ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और तकनीकी सुधार लाए। यह मॉडल आज राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है।
देशभर में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं को लेकर बढ़ती चिंता के बीच उत्तर प्रदेश का 2017 से 2022 के बीच लागू किया गया परीक्षा सुधार मॉडल फिर चर्चा में है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि उत्तर प्रदेश में लागू की गई व्यवस्थाओं को समय रहते राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया होता, तो पेपर लीक और नकल माफिया का नेटवर्क आज इतना बड़ा और संगठित रूप नहीं ले पाता। योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री डॉ. दिनेश शर्मा के नेतृत्व में परीक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए गए। इन सुधारों का उद्देश्य केवल नकल रोकना नहीं था, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी, तकनीक आधारित और विश्वसनीय बनाना था। यही कारण है कि आज भी उत्तर प्रदेश का यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है。
नकल के पर्याय बन चुके थे बोर्ड परीक्षा केंद्र
एक समय ऐसा था जब उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाओं का नाम आते ही सामूहिक नकल, सॉल्वर गैंग और पेपर लीक की खबरें सुर्खियों में आ जाती थीं। वर्षों तक चली इस व्यवस्था ने राज्य की शैक्षणिक साख को गंभीर नुकसान पहुंचाया। ईमानदार विद्यार्थियों को भी दूसरे राज्यों में अपनी योग्यता साबित करने के लिए अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता था।
नकल माफिया के खिलाफ पहला बड़ा कदम
1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह सरकार ने एंटी कॉपिंग एक्ट लागू कर उठाया था। इससे तत्काल प्रभाव तो पड़ा, लेकिन बाद के वर्षों में यह व्यवस्था कमजोर पड़ गई और नकल का संगठित नेटवर्क फिर सक्रिय हो गया। 2017 में नई सरकार बनने के बाद इस समस्या के स्थायी समाधान पर काम शुरू हुआ।
एसटीएफ और खुफिया एजेंसियों के साथ तैयार हुई रणनीति
सरकार ने केवल आदेश जारी करने के बजाय नकल माफिया के पूरे नेटवर्क को समझने का प्रयास किया। एसटीएफ, खुफिया विभाग, शिक्षा अधिकारियों और जिला प्रशासन के साथ कई दौर की बैठकों में यह पता लगाया गया कि परीक्षा केंद्रों का दुरुपयोग कैसे होता है, किन विद्यालयों में सामूहिक नकल कराई जाती है, सॉल्वर गैंग कैसे काम करते हैं और प्रश्नपत्रों तथा उत्तर पुस्तिकाओं की सुरक्षा में कहां-कहां कमजोरियां हैं।इन्हीं इनपुट के आधार पर संवेदनशील जिलों की पहचान की गई और परीक्षा व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से पुनर्गठित किया गया।
सख्ती, तकनीक और पारदर्शिता का त्रिस्तरीय मॉडल
डॉ. दिनेश शर्मा के नेतृत्व में परीक्षा केंद्रों का आवंटन पूरी तरह ऑनलाइन किया गया। सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों को प्राथमिकता दी गई तथा परीक्षा केंद्र बनने के लिए बाउंड्री वाल, शौचालय, पर्याप्त बैठने की व्यवस्था और अन्य आधारभूत सुविधाओं को अनिवार्य बनाया गया।
सभी परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे और ऑडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था लागू की गई। जिला और राज्य स्तर पर कंट्रोल रूम स्थापित किए गए, जहां से परीक्षा की रियल टाइम निगरानी की जाती थी। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 1.91 लाख सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी व्यवस्था विकसित की गई। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ‘सेल्फ सेंटर’ व्यवस्था को समाप्त करना था। विद्यार्थियों को अपने ही विद्यालय में परीक्षा देने की छूट खत्म की गई और शिक्षकों की ड्यूटी भी दूसरे विद्यालयों में लगाई जाने लगी। परीक्षा केंद्रों की संख्या घटाकर निगरानी को और प्रभावी बनाया गया।
नतीजों ने दिखाया सुधारों का असर
इन कदमों का असर 2018 की बोर्ड परीक्षाओं में साफ दिखाई दिया। परीक्षा के शुरुआती तीन दिनों में ही लगभग 6.33 लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा छोड़ दी। इसे विशेषज्ञ नकल आधारित व्यवस्था पर निर्भर नेटवर्क के कमजोर पड़ने का संकेत मानते हैं।
करीब 55 लाख परीक्षार्थियों में से केवल 335 छात्रों के नकल करते पकड़े जाने का आंकड़ा भी परीक्षा व्यवस्था में आए बदलाव का प्रमाण माना गया। इससे यह संदेश गया कि सरकार केवल घोषणाएं नहीं कर रही, बल्कि व्यवस्था को जमीनी स्तर पर बदल रही है।
बिना भारी बजट के तैयार हुआ प्रभावी मॉडल
इस मॉडल की एक बड़ी विशेषता यह रही कि इसके लिए किसी विशाल नए बजट या बड़े निर्माण कार्यों की आवश्यकता नहीं पड़ी। मौजूदा संसाधनों के भीतर तकनीक और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से व्यवस्था को मजबूत किया गया।
उत्तर पुस्तिकाओं की विशेष कोडिंग, प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिकाओं के बंडल खोलने की वीडियोग्राफी, ऑनलाइन प्रशासनिक प्रक्रियाएं, डिजिटल निगरानी और सरकारी तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों को प्राथमिकता देने जैसी व्यवस्थाओं ने परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया।
संसद में भी गूंजी यूपी मॉडल की चर्चा
उत्तर प्रदेश में लागू किए गए परीक्षा सुधारों की गूंज संसद तक पहुंची। फरवरी 2024 में राज्यसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और पेपर लीक रोकने के उपायों पर व्यापक बहस हुई। उस दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावेडकर ने परीक्षा सुधारों और नकल पर अंकुश लगाने के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख किया था। इससे अन्य राज्यों को सीखने को कहा था।
राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी प्रासंगिकता
आज जब केंद्र सरकार पेपर लीक को संगठित अपराध मानते हुए कड़े कानूनों और कठोर दंड की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब उत्तर प्रदेश का यह मॉडल बहुत व्यावहारिक दिखता है। तकनीकी निगरानी, प्रशासनिक जवाबदेही, एसटीएफ की सक्रिय भूमिका, पारदर्शी परीक्षा प्रबंधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के समन्वय से तैयार यह व्यवस्था बताती है कि संगठित नकल और पेपर लीक पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं के भविष्य की रक्षा और परीक्षा प्रणाली में विश्वास बनाए रखने के लिए ऐसे मॉडलों का अध्ययन और व्यापक स्तर पर क्रियान्वयन समय की मांग है। उत्तर प्रदेश में 2017 से 2022 के बीच लागू किए गए सुधारों ने यह साबित किया कि यदि सरकार की मंशा स्पष्ट हो, तकनीक का सही उपयोग हो और प्रशासनिक जवाबदेही तय हो, तो नकल और पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।


