शिव और गंगा की समवेत आराधना में लीन हैं कांवरिया
पेज चार की लीडपेज चार की लीड बोलबम के जयकारों से कांवर पथ हुआ शिवमय, नंगे पांव बढ़ रहे श्रद्धा के कदम 108 किमी की तपस्या में छलक रही

कटोरिया (बांका), निज प्रतिनिधि। कांवर से गंगाजल ले जाने और अभिषेक द्वारा शिव को सौंपने का अनुष्ठान शिव और गंगा की समवेत आराधना है। श्रावणी मेले का दो तिहाई समय बीतने को है, लेकिन कांवरियों की आस्था और उत्साह में तनिक भी कमी नहीं आई है।
कांवरिया की भक्ति
सुल्तानगंज से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर पैदल नंगे पांव बढ़ रहे शिवभक्त कांवरिया इस समय कांवर पथ पर आस्था की मिसाल बने हुए हैं। सोमवार को दिन भर मौसम में धूप और छांव का खेल चलता रहा, लेकिन इन प्राकृतिक बदलावों का कांवरियों पर कोई असर नहीं पड़ा। उनके होंठों पर बोलबम-बोलबम, बाबा नगरिया दूर है, जाना जरूर है जैसे जयघोष ऊर्जा का संचार कर रहे थे। जब मौसम सुहाना होता, तो कांवरियों के कंठ से हर हर महादेव की गर्जना और भी तेज हो जाती। खासकर बॉर्डर के क्षेत्र में पहुंच चुके कांवरिया तीसरी सोमवारी को जलार्पण के लिए अग्रसर रहे।
सेवा शिविरों की भूमिका
इधर, कांवरिया पथ पर सुबह से लेकर देर रात तक कांवरियों की अविरल धारा बह रही है। करीब 108 किलोमीटर की यह कठिन पदयात्रा कांवरियों के लिए तपस्या से कम नहीं है। कांवर लेकर झूमते-लचकते शिवभक्तों के चेहरे पर बाबा भोलेनाथ के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है। बोलबम, बोलबम, बाबा एक सहारा है जैसे नारों से पथ और आसपास का वातावरण गूंज रहा है। ऐसा लगता है मानो धरती और आकाश दोनों महादेव की भक्ति में रमे हुए हों।
श्रद्धा की पराकाष्ठा
कांवरिया पथ के दोनों ओर गांव-गांव, टोला-टोला में सेवा शिविरों की कतारें लगी हैं। प्रशासन द्वारा सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने के साथ-साथ निजी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और स्थानीय ग्रामीणों द्वारा जो निस्वार्थ सेवा की जा रही है, वह श्रद्धा की पराकाष्ठा है। इन शिविरों में कांवरियों के लिए जलपान, आराम, प्राथमिक चिकित्सा और यहां तक कि पैरों की मालिश तक की व्यवस्था है। सेवा शिविरों में काम कर रहे स्वयंसेवक न दिन देखते हैं, न रात। वे बस यही मानते हैं कि कांवरियों की सेवा कर वे स्वयं महादेव की सेवा कर रहे हैं। यह भावना ही श्रावणी मेले की आत्मा है।
धार्मिक यात्रा
कांवर यात्रा, जिसमें कांवरिया हर कष्ट को त्याग कर सिर्फ बाबा की आराधना में लीन रहता है, एक सांस्कृतिक व आध्यात्मिक धरोहर है, जो हर वर्ष और अधिक विशाल और भव्य होती जा रही है। इस संपूर्ण यात्रा में कांवरियों की भक्ति, सेवा शिविरों की निष्ठा और जन-जन की सहभागिता देखकर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि लोक आस्था और समर्पण की अनूठी परंपरा है, जिसमें हर कण, हर कदम भोलेनाथ के नाम हो जाता है।


