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अयोध्या में महाराष्ट्र की सियासत साध रहे उद्धव ठाकरे

उद्धव ठाकरे(एचटी फोटो)

जमीन अयोध्या की थी पर सियासत महाराष्ट्र की। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अयोध्या के मंच से भाजपा पर खूब निशाना साधा। राम मंदिर पर दिया गया वचन याद दिलाया। मंदिर कब बनेगा, इसकी तारीख भी पूछी। लेकिन इसका कोई ठोस तर्क उनके पास नहीं था कि आखिर 2019 की दहलीज पर उन्हें क्यों राम मंदिर की याद आने लगी। वह भी इस बेसब्री से कि वे अयोध्या पहुंच गए और बार-बार आने का वादा भी किया। दरअसल इसके पीछे महाराष्ट्र की सियासत है, जहां हार्डकोर हिन्दुत्व की राजनीति करके भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गई है।

महाराष्ट्र में भाजपा से कमजोर होने की चिंता

भाजपा-शिवसेना का गठबंधन अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त का है। तब से 2014 के चुनाव तक महाराष्ट्र में शिवसेना बड़े भाई की ही भूमिका में रही। भाजपा को वहां छोटे भाई की भूमिका ही मिलती रही। 1995 से 2004 तक हर विस चुनाव में शिवसेना ज्यादा सीटें जीतती रही। 2009 में पहली बार भाजपा 46 सीटें जीती। शिवसेना उससे एक सीट कम रही। यह भी तकरीबन बराबरी का मामला था। लेकिन 2014 में भाजपा ने शिवसेना से तकरीबन दूनी सीटें जीत लीं। भाजपा को 122 सीटें मिलीं जबकि शिवसेना को 63 सीटें। 

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लोकसभा चुनाव में भी ताकत कम हुई 

लोकसभा चुनाव में भी यही हुआ। 1996 के बाद से ज्यादातर चुनावों में भाजपा-शिवसेना की सीटों में कोई बड़ा अंतर नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना से 5 सीटें ज्यादा जीत लीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र में राज ठाकरे की नवनिर्माण सेना ने शिवसेना को कुछ कमजोर किया और कुछ भाजपा की मजबूती ने। ऐसे में मराठी मानुष के साथ हिन्दुत्व के मुद्दे पर हार्डलाइनर दिखना उद्धव की मजबूरी हो गई है। सुरेश प्रभु को मंत्रालय देने जैसे मुद्दे पर भाजपा सरकार से उनका टकराव हो चुका था। ठाकरे शुरू से ही कैबिनेट में शिवसेना के लिए और सीटें चाह रहे हैं, जो उन्हें नहीं मिल सकी। ऐसे में भाजपा पर उनका आक्रमण तीखा होता जा रहा है। ऐन चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा की दुखती रग छेड़ दी है। 

सवाल : क्या अयोध्या से बनाए रखेंगे रिश्ता

अब सवाल यह भी है कि क्या उद्धव अयोध्या से आगे भी रिश्ता बनाए रखेंगे? दरअसल विवादित ढांचा गिरने के बाद तत्कालीन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सीना ठोक कर कहा था कि मुझे इस घटनाक्रम पर गर्व है। हालांकि वे अयोध्या नहीं आए। उनके वारिस उद्धव भी इसके पहले कभी अयोध्या नहीं आए। अब अचानक यहां पहुंच कर उन्होंंने एक नई बहस छेड़ दी है। खुद मंच से उन्होंने कहा कि मैं आता-जाता रहूंगा। माना जा सकता है कि यह बयान भाजपा की पेशानी पर बल लाने के लिए काफी है।

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  • Web Title:Uddhav Thackeray is trying to strength his Maharashtra politics from ayodhya