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कोर्ट का सवाल: SC ने कहा, तीन तलाक पवित्र है तो निकाहनामे से बाहर क्यों

‘तीन तलाक’ को मजहब और आस्था का हिस्सा बता रहे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि तीन तलाक इतना ही पवित्र है तो उसे निकाहनामे में शामिल क्यों नहीं किया गया।...

कोर्ट का सवाल: SC ने कहा, तीन तलाक पवित्र है तो निकाहनामे से बाहर क्यों
श्याम सुमन ,नई दिल्ली, Wed, 17 May 2017 01:37 AM
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‘तीन तलाक’ को मजहब और आस्था का हिस्सा बता रहे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि तीन तलाक इतना ही पवित्र है तो उसे निकाहनामे में शामिल क्यों नहीं किया गया। इसमें सिर्फ एहसन और हसन तलाक (तलाक रद्द करने की शक्ति) को ही रखा जाता है। 
निकाहनामे में महिला में को भी तलाक देने की शक्तियां दी जाती हैं, लेकिन उसे तीन तलाक देने की शक्ति नहीं दी जाती। पांच जजों की संविधान पीठ ने इसी पर सवाल उठाया।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि धार्मिक विद्वानों ने इसकी मनाही की हुई है। लेकिन हम मानते हैं कि यह तलाक का बेहद अवांछनीय रूप है। हालांकि अहले हदीस में इसकी अनुमति है। मगर फिर भी हम समाज को शिक्षित कर रहे हैं और उसे इसके लिए तैयार कर रहे हैं। विमर्श हो रहा है, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि कोई हमें बताए कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। अदालत तो इसमें बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसमें संसद या विधानभाएं ही कानून बना सकती हैं। 

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संविधान पीठ ने पहले दिन ही स्पष्ट कर दिया था कि यदि तीन तलाक धर्म और आस्था का आवश्यक बुनियादी तत्व होगा तो हम उसमें छेड़छाड़ नहीं करेंगे और मामला बंद कर देंगे। लेकिन यदि ऐसा नहीं पाया गया तो इसकी वैधता की समीक्षा होगी। सुनवाई के दौरान पर्सनल लॉ बोर्ड के दस्तावेजों से पढ़कर मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने पूछा कि पैगंबर मोहम्मद के साथी अबूबकर ने कहा है कि तीन तलाक को एक ही तलाक माना जाए। आप कह रहे हैं कि अहले हदीस और शरीया पैगंबर के साथियों ने बनाई है तो फिर अबूबकर तीन तलाक को एक ही तलाक क्यों मान रहे हैं।

सिब्बल ने कहा कि यह अलग-अलग विद्वानों की व्याख्या है, लेकिन तीन तलाक को अहले हदीस में पूरी मान्यता है। संविधान की कसौटी पर कसने के मुद्दे पर सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक आस्था का मामला है जिसका मुस्लिम बीते 1400 वर्ष से पालन करते आ रहे हैं। इसलिए इस मामले में संवैधानिक नैतिकता और समानता का सवाल नहीं उठता है। मुस्लिम संगठन ने तीन तलाक को हिंदू धर्म की उस मान्यता के समान बताया जिसमें माना जाता है कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे। उन्होंने कहा कि इस्लाम के उदय होने के समय वर्ष 637 से तीन तलाक अस्तित्व में है। इसे गैर इस्लामी बताने वाले हम कौन होते हैं। कोर्ट इसे तय नहीं कर सकता। तीन तलाक का स्रोत हदीस में है और यह पैगम्बर मोहम्मद के समय के बाद अस्तित्व में आया। 

सवाल जवाब : 
जस्टिस कुरियन जोसेफ  : तीन तलाक देने का हक महिलाओं को क्यों नहीं दिया गया। 
सिब्बल : कोई जवाब नहीं। (हालांकि बोर्ड ने शपथपत्र में इसका कारण बताया है कि महिलाएं भावुक होती हैं और उन्हें मर्दों की तरह भावनाओं पर कड़ा नियंत्रण नहीं होता)
जस्टिस कुरियन : क्या तीन तलाक में महिलाओं के लिए कोई सुरक्षा है जैसा कि एहसन और हसन तलाक में है। 
सिब्बल : हम इसका जवाब नहीं दे सकते। लेकिन महिलाएं मर्दों से खुद कहती हैं कि उन्हें तीन तलाक दे दे। 
जस्टिस कुरियन : तीन तलाक पैगंबर के साथियों ने तय किया। लेकिन क्या बता सकते हैं कि उस वक्त ऐसी क्या जरूरत थी कि तीन तलाक तय किया गया। 
सिब्बल : इस मुद्दे पर मत जाइए। यह जटिल मामला है इसकी व्याख्या खतरनाक हो सकती है। 
जस्टिस कुरियन : अप कहते हैं कुरान तलाक को गलत कहता है लेकिन यह कौन सा तलाक है। यह तीन तलाक है या तलाक एक, तलाक दो, तलाक तीन है। 
सिब्बल : नहीं। यह आस्था का मामला है, हम बहुत ही जटिल मामले में नहीं जा सकते। 1400 वर्षों से समुदाय इसे मानता आ रहा है।

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