जब वीरता की कोई उम्र नहीं होती: लखनऊ विश्वविद्यालय में गूंजी बाल बलिदानियों की अमर गाथा
लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक विशेष सभा आयोजित की। डॉ. अशोक बाजपेई ने बाल बलिदानियों की शौर्य गाथा का उदाहरण दिया। छात्र उत्कर्ष सिंह ने कम चर्चित नायकों का जिक्र किया, जबकि कार्यक्रम में देशभक्ति गीतों ने भावनात्मक माहौल बनाया।
लखनऊ, प्रमुख संवाददाता। आज़ादी की लड़ाई सिर्फ बड़े क्रांतिकारियों की नहीं, उन मासूम आंखों की भी कहानी है जिन्होंने बचपन में ही मौत को गले लगाना सीख लिया था। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग ने इन्हीं भुला दिए गए नायकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक विशेष सभा आयोजित की, जो देखते ही देखते इतिहास के उन पन्नों को फिर से जिंदा कर गई जिन्हें अक्सर पाठ्यपुस्तकों में जगह नहीं मिलती। मुख्य अतिथि व पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक बाजपेई ने अपने संबोधन में बाल बलिदानी शांति घोष और खुदीराम बोस के साहस को आज की पीढ़ी के लिए मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि जिस उम्र में आज के युवा करियर की योजना बनाते हैं, उस उम्र में इन बच्चों ने देश के लिए प्राण न्योछावर करने का फैसला ले लिया था। उन्होंने एक दिलचस्प ऐतिहासिक कड़ी भी जोड़ी, काकोरी कांड के क्रांतिकारियों की कानूनी लड़ाई लखनऊ विश्वविद्यालय के पहले विधि स्नातक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त ने लड़ी थी, यह तथ्य विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास को भी रेखांकित करता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरविंद मोहन ने शिरीष कुमार मेहता और कनकलता बरुआ का स्मरण करते हुए एक बड़ी बात कही, बड़े क्रांतिकारियों की चर्चा में अक्सर इन नन्हें बलिदानियों का योगदान गुमनाम रह जाता है, जबकि उनका त्याग स्वतंत्रता संग्राम की नींव का हिस्सा है। विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने बाजी राउत, घनश्याम दास, लालदास बानी, शांति घोष और सुनीति चौधरी को नमन करते हुए कहा कि इनकी निर्भीकता आज भी युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित कर सकती है।
छात्रों का योगदान
छात्र उत्कर्ष सिंह ने अपनी प्रस्तावना में तिलेश्वरी बरुआ, ध्रुव कुंडु, रमेशदत्त मालवीय और मनुभाई पटेल जैसे कम चर्चित नामों को सामने लाकर दर्शकों को भावुक कर दिया। उन्होंने विकसित भारत के संकल्प को इन्हीं बलिदानियों के आदर्शों से जोड़ते हुए युवाओं का आह्वान किया कि प्रेरणा दूर नहीं, इतिहास के इन्हीं पन्नों में छिपी है।
माहौल का उत्थान
कार्यक्रम में उत्कर्ष सिंह, अवंतिका सिंह, दीक्षा पाल, मृदुल मिश्रा और शुभम मिश्रा ने देशभक्ति गीतों से माहौल को भावनात्मक बना दिया। संचालन अद्विका सिंह और समन्वय नितिन सिंह ने बखूबी संभाला। कार्यक्रम में विभागीय शिक्षकगण व छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में मौजूद रहे, जिन्होंने इन गुमनाम नायकों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।


