ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक को राज्यसभा से मिली मंजूरी
राज्यसभा में मंगलवार को ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक 2026 पारित हुआ। इसके तहत विभिन्न ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए एक आयोग गठित किया जाएगा। विधेयक का उद्देश्य न्यायपालिका में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना है। उच्चतम न्यायालय ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है।

राज्यसभा में मंगलवार को ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक 2026 संक्षिप्त चर्चा के बाद पारित हो गया। इसमें अलग-अलग ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और मेंबर्स के चयन के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान है। राज्यसभा में बिल पर चर्चा का कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की ओर से जवाब दिए जाने के बाद इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। लोकसभा से बिल पहले ही पारित हो चुका है। विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए कानून मंत्री मेघवाल ने कहा कि यह विधेयक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में देश में चल रही ‘सुधार एक्सप्रेस’ का हिस्सा है। उन्होंने कहा, विधेयक न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र बदलने का विधेयक नहीं है, बल्कि इसका प्रमुख मकसद अलग-अलग न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए दक्षता बढ़ाना, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और पात्रता संबंधी मानदंडों में एकरूपता तय करना है। विधेयक पर हुई चर्चा में हिस्सा लेने वाले सदस्यों ने कहा कि इससे देश में ट्रिब्यूनल सिस्टम को मजबूत करने और देश की अदालतों में लंबित बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। कुछ सदस्यों ने कहा कि राष्ट्रीय आयोग के गठन से न्यायाधिकरणों के गठन में पारदर्शिता बढ़ेगी。
आयोग में एक अध्यक्ष और चार मेंबर होंगे
प्रस्तावित आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। इसमें एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य होंगे। इनमें दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश प्रस्तावित आयोग के अध्यक्ष पद के लिए पात्र होंगे। बिल के ड्राफ्ट के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने हाल में ‘न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021’ के कुछ प्रावधानों को इस आधार पर निरस्त कर दिया था कि वे शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
उच्चतम न्यायालय ने दिया था निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने एक ऐसे राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया था, जो स्वतंत्र हो, जिसमें पेशेवर विशेषज्ञता हो और विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन एवं नियुक्ति के लिए पारदर्शी प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था अपनाई जाए। इस विधेयक के कानून का रूप लेने के बाद 2021 का अधिनियम निरस्त हो जाएगा।
आप ने उठाया जजों की नियुक्ति पर सवाल
चर्चा के दौरान आप सांसद संजय सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति में एससी-एसटी से आने वाले जजों की नियुक्ति बहुत कम की जा रही। इस पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम करता है। इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका केवल कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी देना भर है।
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