सिवाया टोल प्लाजा पर लागत से अधिक हो चुकी वसूली
मेरठ-मुजफ्फरनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सिवाया टोल प्लाजा की मूल अनुबंध अवधि समाप्त हो चुकी है, फिर भी टोल वसूली जारी है। नियमों के अनुसार, लागत वसूलने के बाद टोल बंद होना चाहिए या दरें कम होनी चाहिए, लेकिन स्थिति इसके विपरीत है। वाहन चालकों को बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।

मेरठ/दौराला। मेरठ-मुजफ्फरनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच 58) स्थित सिवाया टोल प्लाजा चर्चा के केंद्र में है। इस टोल प्लाजा की मूल अनुबंध अवधि 25 जून 2026 को समाप्त हो चुकी है, इसके बावजूद वाहन चालकों से धड़ल्ले से टोल वसूला जा रहा है। नियमों के मुताबिक निर्माण लागत वसूलने के बाद या तो टोल बंद होना चाहिए या दरों में भारी कमी आनी चाहिए, लेकिन धरातल पर स्थिति बिल्कुल उलट है। मेरठ-मुजफ्फरनगर एनएच 58 यह पैच 77.89 किलोमीटर लंबा है। इसे बनाने में लगभग 359 करोड़ रुपये की लागत आई थी, जिसे नागार्जुन कॉन्ट्रैक्टर कंपनी ने फोरलेन करने के दौरान तैयार किया था। मूल लागत से काफी पहले ही वसूली पूरी हो चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2016 तक ही इस टोल से 453.60 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं, जो निर्माण लागत से कहीं अधिक है। नागार्जुन कंपनी के बाद यह क्यूब हाईवे कंपनी के पास गया, जिसका अनुबंध जून 2023 में समाप्त हुआ। इसके बाद कुछ समय एनएचएआई के नियंत्रण में रहने के बाद वर्तमान में यह टेंडर के जरिए 'स्काई लार्क' कंपनी के पास है। अब अन्य निर्माण कार्यों में 200 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च का हवाला देकर अनुबंध अवधि खत्म होने के बाद भी टोल वसूली जारी रखी गई है。
नियमों की पेचीदगी और जनता के सवाल
राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दर निर्धारण और संग्रह) नियम, 2008 के अनुसार, किसी भी टोल प्लाजा की लागत वसूल हो जाने के बाद उसकी दरें 40 प्रतिशत तक कम कर दी जानी चाहिए। सिवाया टोल पर लागत वसूले हुए एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन न तो दरें कम हुईं और न ही टोल बंद हुआ।
बंटी हुई जिंदगी
वहीं एनएचएआई और संबंधित महकमों का तर्क है कि इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर समय-समय पर अन्य निर्माण कार्य, रखरखाव और अपग्रेडेशन पर भारी भरकम बजट खर्च किया गया है। अधिकारियों का दावा है कि इन्हीं अतिरिक्त विकास कार्यों और नए प्रोजेक्ट्स के वित्तीय समायोजन के चलते टोल संचालन की समयावधि और वसूली की प्रक्रिया को नियमों के दायरे में आगे बढ़ाया गया है।
बुनियादी सुविधाओं की कमी
सिवाया, भराला, दौराला, दुल्हैड़ा, पबरसा, बफावत, पनवाड़ी, अखित्यारपुर, समौली और खेड़ी जैसे आधा दर्जन से अधिक गांवों के लोगों के खेत, मकान और रिश्तेदारियां सड़क के दोनों और बंटी हुई हैं। कई लोगों के मकान मोदीपुरम में हैं जबकि खेती गांव में है, जिससे रोजाना आवागमन में भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी उठानी पड़ती है।
भारी-भरकम टोल टैक्स चुकाने के बावजूद वाहन चालकों को हाईवे पर गड्ढामुक्त सड़कें, दुरुस्त स्ट्रीट लाइट और आपातकालीन स्थिति के लिए आधुनिक एम्बुलेंस व हाइड्रा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं।


