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टीपू सुल्तान के ख्वाबः एक बहादुर नायक की त्रासदी

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ नाटककार गिरीश कारनाड का यह नाटक टीपू सुल्तान के जीवन पर आधारित है। 20 नवंबर 1753 को कर्नाटक के देवनहल्ली में जन्मे टीपू सुल्तान को भारतीय इतिहास के प्रमुख व्यक्तित्वों में शुमार किया जाता है। 7 दिसंबर 1782 को अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद वह मैसूर का शासक बना। एक शासक के रूप में अपनी सूझबूझ और साहस के कारण वह लगातार सुर्खियों में रहा। अंग्रेजों से युद्ध करते हुए 4 मई 1799 को श्रीरंगपत्तन में उसकी मौत हुई, लेकिन ‘मैसूर के शेर' के रूप में उसकी छवि जनमन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।

यह नाटक इसी टीपू सुल्तान के जीवन के अंतिम दिनों का चित्र प्रस्तुत करता है। साथ ही उसके बहुआयामी व्यक्तित्व के अपेक्षाकृत कम ज्ञात पहलुओं को उजागर करता है, जिससे उसकी महानता और पुष्ट होती है। टीपू बहादुर था और उसके जीवन का खासा समय संघर्ष में गुजरा। लेकिन इस नाटक में हम देखते हैं कि वह दिन में युद्ध लड़ता था और रात में पढ़ता था। वह सपने बहुत देखता था और उन्हें अपनी डायरी में दर्ज कर लेता था। उसके सपनों से न केवल उसकी महत्वाकांक्षा का पता चलता है, बल्कि यह भी मालूम होता है कि साम्राज्यवादी अंग्रेजों के रूप में हिंदुस्तान पर मंडरा रहे खतरे को खत्म करने के लिए वह कितना व्यग्र था। नाटक में एक जगह टीपू कहता है, आज पूरे हिंदुस्तान में मैं अकेला ऐसा हूं जो उनके (अंग्रेजों) इशारों पर नहीं नाचता, इसलिए वो मुझे कुचल देना चाहते हैं।

वास्तव में वह आने वाले समय का अंदाजा कर पा रहा था, जब अंग्रेज हिंदुस्तान पर गुलामी थोपने वाले थे। वह अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसियों को अपने साथ करने में सफल रहा। लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ मराठों और निजाम के साथ एकता का उसका स्वप्न, स्वप्न ही रह गया।

टीपू सुल्तान के ख्वाब, गिरीश कारनाड, अनुवाद : जफर मुहीउद्दीन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।

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  • Web Title:tipu sultan ke khwab tragedy of a brave hero