The results of Chhattisgarh Madhya pradesh and Rajasthan gave a big lesson to the political parties of Uttar pradesh - CG, MP और राजस्थान के नतीजों ने दिया यूपी की राजनीतिक पार्टियों को बड़ा सबक, रणनीति बदलने पर किया मजबूर DA Image
23 नवंबर, 2019|7:20|IST

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CG, MP और राजस्थान के नतीजों ने दिया यूपी की राजनीतिक पार्टियों को बड़ा सबक, रणनीति बदलने पर किया मजबूर

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राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यूपी में सियासी दलों को बड़ा सबक दिया है। लोकसभा चुनाव-2019 के मद्देनजर ये नतीजे सत्तारूढ़ भाजपा हो या फिर विपक्ष दोनों को रणनीति में बदलाव के लिए मजबूर करेंगे। कांग्रेस को जहां यूपी में संजीवनी मिलेगी वहीं भाजपा के लिए असंतुष्टों को साथ रखने और आम लोगों के बीच पार्टी की पकड़ बनाए रखने की कड़ी चुनौती होगी। चुनाव परिणाम लोकसभा चुनावों में गठबंधन का गुणा-भाग बैठाने में जुटे विपक्ष को आक्सीजन तो देंगे ही, सपा-बसपा और कांग्रेस के लिए मतभेद भुलाकर एकजुट होने का बड़ा मौका पेश करेंगे।

भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ीं
2019 में फिर से केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की आस बांधे बैठी भाजपा के लिए तीनों राज्यों के चुनाव नतीजे एक बड़े झटके के रूप में सामने आए हैं। ऐसे में जब भाजपा राजस्थान को छोड़कर छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश में वापसी की उम्मीद लगाए थी, भाजपा के रणनीतिकारों के लिए नतीजों ने कई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। पहली चुनौती सत्ता विरोधी लहर को संतुलित करना होगा। यूपी में भाजपा को सरकार बनाए 21 महीने से ज्यादा हो गए हैं और अगले पांच महीनों में लोकसभा चुनावों का बिगुल बज जाएगा। ऐसे में सरकार से आम लोगों की नाराजगी, उसके कामकाज, कार्यकर्ताओं के असंतोष को संतुलित करना होगा।

कांग्रेस का यूपी में कद बढ़ेगा 
तीनों राज्यों में भाजपा से जोरदार टक्कर लेने वाली कांग्रेस को यूपी में भी संजीवनी मिलेगी। कांग्रेस जहां लोकसभा चुनावों में एक बार फिर वर्ष 2004 और 2009 जैसे तेवर में दिखे तो हैरत नहीं। इस नतीजों से कांग्रेस के उस दावे को भी बल मिलेगा कि भाजपा से लोकसभा चुनावों में टक्कर सिर्फ उसके नेतृत्व में ही ली जा सकती है। ऐसे में कांग्रेस लोकसभा चुनावों में महागठबंधन में अन्य सियासी दलों को अपनी शर्तों पर हिस्सेदारी देने का दबाव बनाएगी।

सपा-बसपा को करना होगा रणनीति में बदलाव
इन तीन राज्यों के चुनावों में कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने वाली सपा-बसपा को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। नतीजों का असर यह होगा कि महागठबंधन के लिए दिल्ली में बुलाई गई बैठक में गैरहाजिर रहे दोनों दलों सपा व बसपा को नए सिरे सीटों के बंटवारे पर सोचना होगा। अंदरखाने जहां सपा-बसपा अभी तक कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में अपने साथ न लेने की रणनीति पर आगे बढ़ रही थीं, उन्हें अब इस पर विचार करना होगा कि कैसे कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ एक प्रबल गठजोड़ का विकल्प पेश करें।

जातीय समीकरण पर ध्यान
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां जीत के लिए आदिवासी व दलितों का गठजोड़ खासी अहमियत रखता है, वहां भाजपा की करारी हार के अपने सबक हैं। सियासी जानकारों का दावा है कि एससी-एसटी एक्ट के मसले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में बदलाव का सवर्णों में भी खासा असंतोष रहा। सवर्णों की नाराजगी के मद्देनजर करारी हार देखने को मिली। शायद यही वजह रही कि तीनों राज्यों में बसपा आधा दर्जन के करीब सीटों पर अच्छा प्रदर्शन कर सकी। ऐसे में यूपी में भी देखना होगा कि लोकसभा चुनावों में कैसे जातीय समीकरण जीत की कसौटी पर खरे उतरें। मसलन,भाजपा को सवर्णों के असंतोष के साथ ही अपने पिछड़े  वोट बैंक को समेटे रखने की चुनौती होगी। आने वाले वक्त में पिछड़ों को आरक्षण में ज्यादा हिस्सेदारी देने का फैसला हो तो हैरत नहीं।

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