संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, भारतीय ज्ञान-परम्परा की मूल संवाहिका : प्रो. रविन्द्र
बैजनाथ पांडेय आर्य संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत-सप्ताह समारोह के दौरान संस्कृत भाषा की आवश्यकता, उपयोगिता, सरलता और ऐतिहासिक महत्त्व पर चर्चा हुई। मुख्य वक्ता प्रो. रविन्द्र पाठक ने संस्कृत की ज्ञान परम्परा को महत्वपूर्ण बताकर इसकी दैनिक उपयोग पर जोर दिया। कार्यक्रम में कई शिक्षकों और विद्यार्थियों ने संस्कृत की विशेषताओं पर विचार प्रस्तुत किये।

सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। बैजनाथ पांडेय आर्य संस्कृत महाविद्यालय में आयोजित संस्कृत-सप्ताह समारोह के क्रम में छट्ठें दिन रविवार को संस्कृत भाषा की आवश्यकता, उपयोगिता, सरलता, ऐतिहासिक महत्त्व व विभिन्न शास्त्रों में निहित दार्शनिक तत्त्वों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता व डीएवी पीजी कॉलेज के सेवानिवृत्त आचार्य प्रो. रविन्द्र पाठक ने संस्कृत की आवश्यकता व वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की मूल संवाहिका है। संस्कृत में भारत की विशाल ज्ञान-संपदा सुरक्षित है। वेद, उपनिषद्, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, गणित व अनेक ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का मूल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल पूजा-पाठ अथवा धार्मिक भाषा तक सीमित करना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है।


