DA Image
हिंदी न्यूज़ › देश › खत्म हो जाएगा पर्यावरण की अलख जगाने वाले रैंणी गांव का अस्तित्व, जानें इसके बारे में सबकुछ
देश

खत्म हो जाएगा पर्यावरण की अलख जगाने वाले रैंणी गांव का अस्तित्व, जानें इसके बारे में सबकुछ

मदन जैड़ा, हिन्दुस्तान,नई दिल्ली।Published By: Himanshu Jha
Sun, 01 Aug 2021 02:22 PM
खत्म हो जाएगा पर्यावरण की अलख जगाने वाले रैंणी गांव का अस्तित्व, जानें इसके बारे में सबकुछ

उत्तराखंड के चमोली जिले के जिस रैंणी गांव से विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई थी वह गांव आज सर्वाधिक प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में है। पर्यावरण विशेषज्ञों की एक टीम ने इस गांव का दौरा किया और पाया कि इस गांव के लोगों को यदि बचाना है तो उन्हें वहां से अन्यत्र स्थानांतरित करना होगा। अब तक आ चुके दर्जनों भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ से गांव स्थानीय निवासीयों के लिए खतरनाक बन चुका है।  

पर्यावरण पर कार्यरत क्लाईमेट ट्रेंड्स की एक रिपोर्ट के अनुसार चिपको आंदोलन का नेतृत्व करने वाली गौरा देवी की प्रतिमा को हाल में रैंणी गांव से हटाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है। यह घटना हमारे ऊपर मंडरा रहे आसन्न जलवायु खतरे को इंगित करती है। रैंणी गांव समुद्र तल से 3700 मीटर की ऊंचाई पर ऋणिगंगा नदी के ढलान पर स्थिति है। यही से 1973 विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई थी। राष्ट्रीय वन संरक्षण कानून भी इसी आंदोलन के बाद पारित हुआ। 

अलकनंदा नदी पर हिमस्खलन एवं एक ग्लेशियर के टूटने के बाद विगत 7 फरवरी को रैंणी गांव में अचानक भारी बाढ़ आ गई थी। इससे क्षेत्र में भारी तबाही मची। लेकिन यह सिलसिला यही नहीं थमा। 14 जून को फिर क्षेत्र में अचानक भारी बारिश के कारण बाढ़ आ गई। कई घरों को नुकसान पहुंचा जिससे ग्रामीणों में दहशत फैल गई। रैंणी गांव के नीचे जोशीमठ-मलारी मार्ग का एक बड़ा हिस्सा धंस गया जिससे चमोली जिले के एक दर्जन से अधिक गांवों से संपर्क टूट गया।  

प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे रैंणी गांव के लोगों ने वहां से स्थानांतरित किए जाने की मांग रखी। इसके बाद उत्तराखंड सरकार के भूगर्भ वैज्ञानिकों की एक टीम ने भी स्थिति का आकलन किया और रिपोर्ट सरकार को सौंपी। 

राज्य के आपदा प्रबंधन अधिकारी नंद किशोर जोशी के अनुसार रैंणी गांव के निचले हिस्से में 55 परिवार रहते हैं लेकिन वह जगह अब इंसानों के रहने लायक नहीं है। इन्हें सुभाई गांव में बसाने का फैसला लिया गया है।  

जोशी ने कहा कि लोगों के एक झुंड को दूसरी जगह स्थानांतरित करने से सिंचाई, चारे और खेती की भूमि के साधनों पर भी प्रभाव पड़ता है जो फिर बड़ी संख्या में लोगों के बीच विभाजित हो जाती थी। इसलिए हम प्रभावित परिवारों को 300-500 मीटर के दायरे में स्थानांतरित करने का प्रयास करेंगे, ताकि उन्हें कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। 

रैणी गाँव की निवासी संजू कापरवान ने कहा, ‘ग्रामीणों को पुनर्वास के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। शुरुआत में प्रशासन चाहता था कि हम प्राथमिक विद्यालय में एक अस्थाई स्थान पर शिफ्ट हो जाएं लेकिन यह हमारे मवेशियों के बग़ैर था। अगर हमारे मवेशियों को कुछ हो गया तो क्या होगा, तो नुकसान कौन उठाएगा। अब उन्होंने हमें सुभाई गाँव के पास एक स्थान पर स्थानांतरित करने का फैसला किया है, लेकिन फिर से जैसा कि हमने अन्य मामलों में देखा है, हमें आवंटित किया गया स्थान काफ़ी कम है। इसके अलावा हमें डर है कि यह फैसला सिर्फ कागजों पर ही न रह जाए। मानसून आ चुका है और हम हर रात इस इस डर में बिता रहे हैं कि क्या हम कल तक जीवित रहेंगे या नहीं’ 

स्थानी पर्यावरण कार्यकर्ता अतुल सत्ती खतरे के लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं कि उत्तराखंड में पर्यटकों की तादात भी बढ़ी है। पहले छह लाख पर्यटक हर साल आते थे लेकिन अब 15 लाख आते हैं। इससे निर्माण गतिविधियों एवं प्रदूषण में भी बढ़ोत्तरी हुई है जिससे पहाड़ों की जलावयु प्रभावित हुई है। साथ ही बर्फबारी का पैटर्न भी बदल चुका है।  

मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत के अनुसार लगातार बारिश, बादल फटने की घटनाओं से भू स्खलन का खतरा पहाड़ों में लगातार बढ़ रहा है। वैसे भी जलवायु परिवर्तन के चलते चरम मौसमी घटनाएं बढ़ी हैं। विकास योजनाओं एवं वनों के कटाने ने पहाड़ों में इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।  

केंद्रीय जल आयोग के निदेशक शरत चंद्र ने कहा कि हिमालयीर प्रणालियां बहुत युवा एवं नाजुक हैं जो उन्हें अस्थिर बनाती हैं। इससे भूस्खलन के मामले बढ़ रहे हैं।  

संबंधित खबरें