The Bharatiya Janata Party pay big price for overconfidence - झटका: भारतीय जनता पार्टी को महंगा पड़ा आत्मविश्वास DA Image
8 दिसंबर, 2019|3:23|IST

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झटका: भारतीय जनता पार्टी को महंगा पड़ा आत्मविश्वास

shiv sena chief uddhav thackeray and home minister amit shah  pti photo shirish shete   pti2 18 2019

महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनने से भी बड़ा झटका भाजपा के लिए यह है कि उसके करीब तीन दशक और सबसे पुराने सहयोगी ने उसका साथ छोड़ दिया। पुराना होने के साथ-साथ समान विचारधारा का साथी होने की वजह से शिवसेना को लेकर भाजपा की सोच यही रही है कि वह भाजपा को छोड़कर कहां जाएगी? लेकिन अबकी बार *यह आत्मविश्वास भाजपा को महंगा *पड़ गया।

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद का विवाद भाजपा-शिवसेना के रिश्ते टूटने का एक अकेला कारण नहीं है। 2014 में केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद से ही दोनों के रिश्तों में तल्खी आनी शुरू हो गई थी। लोकसभा चुनाव दोनों ने मिलकर लड़ा लेकिन केंद्र में शिवसेना को ज्यादा भागीदारी नहीं मिलने से वह नाराज हुई।

कुछ ही समय बाद विधानसभा चुनाव होने थे लेकिन उनमें साथ लड़ने पर सहमति नहीं बन सकी। पुराने साथी की परवाह किए बगैर भाजपा मैदान में उतरी। माहौल उसके अनुकूल था। लेकिन 122 सीटों पर अटक गई। फिर उसे पुराने दोस्त की याद आई और शिवसेना को मना लिया। शिवसेना के पास भी कोई विकल्प नहीं था। वह सरकार में शामिल तो हो गई लेकिन रिश्तों में तल्खी जारी रही। बाद में केंद्र में सुरेश प्रभु को मंत्री बनाए जाने से भी शिवसेना खुश नहीं थी। लेकिन भाजपा ने परवाह नहीं की।

2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी शुरू हुई तो भाजपा बहुमत को लेकर सशंकित थी। उसने शिवसेना की नाराजगी दूर करके उसे साथ चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया। वर्ना, शिवसेना अकेले मैदान में उतरने जा *रही थी। सूत्र बताते हैं शिवसेना की दो शर्तें तब थीं कि एक राज्य विधानसभा चुनाव भी साथ मिलकर लड़ा जाए और सत्ता में बराबर की भागीदारी हो। यदि शिवसेना के दावे को सही माना जाए तो भाजपा ने इस पर हामी भी भरी थी। भाजपा ने इससे इनकार किया है।

लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में इस बार भी दोनों दलों का प्रदर्शन अच्छा रहा। लेकिन शिवसेना की नाराजगी थी कि उसको केंद्र में इस बार भी एक ही मंत्री दिया। दूसरे, शिवसेना लोकसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पदों को लेकर भी उम्मीद कर रही थी जो पूरी नहीं हुई। विधानसभा चुनावों में दोनों सहयोगियों की सीटें घटीं लेकिन शिवसेना सत्ता में बराबर की हिस्सेदारी को लेकर अपनी जिद पड़ अड़ गई।

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