अन्याय हमेशा के लिए नहीं रहता : तस्लीमा
- 19 साल बाद कोलकाता लौटीं तस्लीमा नसरीन - मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने स्वागत

कोलकाता, एजेंसी। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने 19 साल बाद कोलकाता लौटने पर कहा कि उनकी वापसी इस बात का प्रमाण है कि अन्याय लंबे समय तक चल सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं रहता। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नसरीन का कोलकाता में स्वागत किया है।
तस्लीमा का संघर्ष
तस्लीमा ने यह भी कहा कि उनकी लड़ाई हमेशा महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए रही है, किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं। शहर में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भावुक नजर आईं 63 वर्षीय तस्लीमा ने कहा कि कोलकाता लौटना उनके लिए लंबे व्यक्तिगत निर्वासन के अंत जैसा है। उन्होंने कहा कि कोलकाता लौटकर ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपनी जिंदगी के उस हिस्से में वापस आ गई हूं, जिसे मैं यहीं छोड़ गई थी। उनको वर्ष 2007 में कोलकाता छोड़ना पड़ा था। इससे पहले 1994 में धर्म और धार्मिक कट्टरता पर अपने लेखन तथा विचारों के कारण कट्टरपंथी संगठनों से जान से मारने की धमकियां मिलने के बाद उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष हमेशा महिलाओं के अधिकारों, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए रहा है और इसे किसी राजनीतिक विचारधारा या दल से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
शुभेंदु का स्वागत
उधर, शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को रवींद्र सदन में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए निर्वासित लेखिका को राज्य में आने पर पूरी सुरक्षा का भरोसा दिलाया। सूचना और संस्कृति मामलों का विभाग संभालने वाले अधिकारी ने रवींद्र सदन में मशहूर लेखिका का व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया और उन्हें बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की तस्वीर और 'वंदे मातरम' की 150वीं वर्षगांठ पर तैयार एक यादगार किताब भेंट की।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में विरोध
जॉय गोस्वामी को मंच पर बुलाने पर हुआ विरोध
तस्लीमा नसरीन के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान उस समय कुछ देर के लिए हंगामा हो गया, जब उन्होंने प्रख्यात बांग्ला कवि जॉय गोस्वामी को मंच पर आने का निमंत्रण दिया। दर्शकों के एक वर्ग ने इसका विरोध किया, जिसके कारण उनका संबोधन कुछ समय के लिए बाधित हो गया।
लौटने की कथा
'फेरा' उपन्यास की कहानी जैसी है उनकी घर वापसी
तस्लीमा नसरीन शनिवार को लगभग दो दशक बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से कोलकाता पहुंचीं। उनकी यह वापसी कई मायनों में उनके चर्चित उपन्यास 'फेरा (द रिटर्न)' की याद दिलाती है। हालांकि दोनों यात्राओं की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन विस्थापन, स्मृतियों और अपनेपन की तलाश का साझा भाव दोनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 'फेरा' की नायिका कल्याणी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आने वाली एक हिंदू महिला है, जो वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है। उपन्यास में विभाजन की त्रासदी, महिलाओं की चुनौतियों और पहचान के संकट को प्रमुखता से उकेरा गया है.


