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भारत में अफगानिस्तान के राजनयिक मिशनों पर तालिबान का नियंत्रण, लंदन भागे राजदूत मामुंदजई

मामुंदजई को अफगानिस्तान में पूर्ववर्ती अशरफ गनी सरकार ने नियुक्त किया था और अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा करने के बाद भी वह अफगान राजदूत के रूप में काम कर रहे थे।

भारत में अफगानिस्तान के राजनयिक मिशनों पर तालिबान का नियंत्रण, लंदन भागे राजदूत मामुंदजई
Amit Kumarलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीWed, 29 Nov 2023 08:35 PM
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काबुल में अमेरिका समर्थित सरकार को हटाने के दो साल से अधिक समय बाद तालिबान ने भारत में राजनयिक मिशनों पर असली नियंत्रण ले लिया है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब पिछले सप्ताह अफगानिस्तान के दूतावास ने भारत सरकार की ओर से लगातार चुनौतियां आने का दावा करते हुए अपना काम-काज ‘‘स्थायी रूप से’’ बंद करने की घोषणा की थी। अफगानिस्तान के दूतावास ने 30 सितंबर को घोषणा की थी कि वह एक अक्टूबर से अपना काम-काज बंद रहा है। उस समय मिशन ने भारत सरकार से समर्थन नहीं मिलने, अफगानिस्तान के हितों को पूरा करने में अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाने और कर्मियों एवं संसाधनों की कमी के कारण यह कदम उठाए जाने की बात कही थी।

अब खबर है कि उन मिशनों का नियंत्रण तालिबान ने अपने हाथों में ले लिया है। सरकारी टेलीविजन चैनल आरटीए के साथ मंगलवार को एक इंटरव्यू के दौरान तालिबान के उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई ने कहा, "मुंबई और हैदराबाद में हमारे वाणिज्य दूतावास काम कर रहे हैं और विदेश मंत्रालय के संपर्क में हैं।" हाल के महीनों में, तालिबान भारत के करीब आया है। भारत तालिबान को कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ करीबी सहयोगी के रूप में देखता है। 

गौरतलब है कि भारत में अफगानिस्तानी दूतावास का नेतृत्व राजदूत फरीद मामुंदजई ने किया। मामुंदजई को अफगानिस्तान में पूर्ववर्ती अशरफ गनी सरकार ने नियुक्त किया था और अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा करने के बाद भी वह अफगान राजदूत के रूप में काम कर रहे थे। नई दिल्ली में पूर्व अफगान राजदूत फरीद मामुंदजई ने ब्लूमबर्ग न्यूज को बताया कि अमेरिका समर्थित सरकार के तहत नियुक्त दर्जनों अफगान राजनयिकों ने भारत छोड़ दिया है। उन्होंने कहा, जो लोग बचे हैं वे तालिबान के विदेश मंत्रालय का समर्थन करते हैं।

मामुंदजई ने कहा, “भारत ने काबुल से प्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त लोगों के प्रति समर्थन दिखाते हुए राजनयिकों को तालिबान सरकार के साथ जुड़ने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया है।” मामुंदजई ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया और कई महीने पहले लंदन चले गए। भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं आई है। भारत में काम करने वाले अफगान राजनयिकों में मुंबई में महावाणिज्य दूत जकिया वारदाक और हैदराबाद में सैयद मोहम्मद इब्राहिमखेल, साथ ही व्यापार परामर्शदाता मोहम्मद कादिर शाह हैं। मामुंदजई के अनुसार, ये लोग तालिबान के पीछे खड़े हैं।

भारत तालिबान के साथ जुड़ने के रास्ते तलाश रहा है। भारत अफगानिस्तान में अपने निवेश की रक्षा करना चाहता है और वहां प्रभाव बनाए रखना चाहता है। नई दिल्ली ने भोजन और दवा जैसी मानवीय सहायता की आपूर्ति के लिए पिछले साल काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला। अफगान नागरिकों के लिए वीजा सहित कांसुलर सेवाएं अभी भी काफी हद तक निलंबित हैं।

चीन, पाकिस्तान और रूस सहित मुट्ठी भर देशों ने तालिबान राजनयिकों को अपने देशों में स्वीकार कर लिया है, लेकिन वे औपचारिक रूप से सरकार को मान्यता नहीं देते हैं। लगभग सभी देश तालिबान की मानवाधिकार उल्लंघन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा करते रहे हैं। सितंबर में तालिबान को राजनयिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने वाला चीन पहला देश था।

तालिबान द्वारा अप्रैल-मई में मामुंदजई की जगह मिशन का नेतृत्व करने के लिए अस्थायी राजदूत की नियुक्ति की खबरें आई थीं। इसके बाद दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा था कि उसके नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं हुआ है। भारत ने तालिबान प्रशासन को अभी तक मान्यता नहीं दी है और वह काबुल में असल समावेशी सरकार के गठन की वकालत कर रहा है। वह इस बात पर जोर देता रहा है कि अफगान धरती का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

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