1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाला टी-55 टैंक, अंबेडकर नगर में आज भी कह रहा शौर्य

हिन्दुस्तान, लखनऊ
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1965 और 1971 के युद्धों का गवाह टी-55 टैंक अब अंबेडकरनगर में युवाओं को शौर्य, देशभक्ति और सेना में शामिल होकर राष्ट्रसेवा की प्रेरणा दे रहा है।

1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाला टी-55 टैंक, अंबेडकर नगर में आज भी कह रहा शौर्य

अनिल तिवारी, अम्बेडकर नगर। भारतीय सेना ने जिस टैंक से पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे, वह आज भी अपने शौर्य की कहानी कह रहा है। जब-जब भारत और दुश्मन के बीच युद्धों की चर्चा होती है, हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। साल 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ हुए युद्धों में भारतीय सेना ने जिस अदम्य साहस और रण कौशल का परिचय दिया, उसमें रूस निर्मित टैंक टी-55 की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही वह टैंक है, जिससे भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। आज वही गौरव गाथा का प्रतीक टैंक उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के मुख्यालय अकबरपुर में सीना ताने खड़ा है। कलेक्ट्रेट के निकट अकबरपुर राजकीय हवाई पट्टी के सामने स्थापित यह टी-55 टैंक न सिर्फ इतिहास का साक्षी है, बल्कि हर नागरिक के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित कर देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह टैंक आज भी आने वाले किसी भी दुश्मन को ललकार रहा हो और युवाओं को सीमा पर बढ़ते खतरों के प्रति आगाह करते हुए सेना में शामिल होकर चुनौतियों का सामना करने का साहस दे रहा हो।

टी-55 टैंक की विशेषताएँ

रूस में निर्मित टैंक टी-55 का निर्माण शीत युद्ध के दौर में हुआ था और एक समय यह दुनिया के सबसे ताकतवर टैंकों में गिना जाता था। भारतीय सेना में शामिल होने के बाद इसने दशकों तक देश की सेवा की। इस टैंक में 12.7 एमएम की एंटी एयरक्राफ्ट गन, 7.6 एमएम की मशीन गन और 100 एमएम की मुख्य तोप राइफल गन लगी है। यह टैंक 35 से 40 राउंड तक लगातार फायर करने की क्षमता रखता है। जमीन से लेकर आसमान तक दुश्मन और उसके जहाजों को मार गिराने की ताकत रखने वाला यह टैंक, रेतीले इलाकों में 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है और कम पानी में भी संचालित हो सकता है।

टैंक की निर्माण क्षमता

581 हॉर्स पावर के इंजन से लैस यह टैंक एक बार ईंधन भरने पर 400 से 600 किलोमीटर तक लगातार चल सकता है। मुख्य तोप के बैरल के साथ इसकी लंबाई नौ मीटर और बिना बैरल के 6.27 मीटर है। 3.15 मीटर चौड़ा और 2.4 मीटर ऊंचा यह 36 टन वजनी टैंक मजबूत सुरक्षा कवच से लैस है। इसके आगे 120 एमएम, बगल में 80 एमएम और पीछे 45 एमएम मोटी लोहे की चादरें इसे अभेद बनाती हैं। चालक सहित इसमें चार क्रू सदस्य सवार हो सकते हैं।

टैंक का उद्देश्य

अंबेडकर नगर को यह गौरव सेंट्रल आर्मी फाइटिंग व्हीकल डिपो, पुणे से मिला है। भारतीय सेना के मानक और सम्मान के साथ इस टैंक को अकबरपुर हवाई पट्टी के सामने स्थापित किया गया है। युवाओं को भारतीय सेना के शौर्य से परिचित कराने और उन्हें सेना में भर्ती होकर राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से इसे यहां लगाया गया है। शासन से अनुमोदन लेकर और पुणे डिपो से आवंटन कराकर इसे यहां स्थापित कराया गया था। टैंक के लिए मजबूत चबूतरा तैयार किया गया है तथा बेहतर प्रकाश, सम्मान और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की गई है।

गौरव का प्रतीक

टी-55 टैंक को देखकर हर हिंदुस्तानी का सीना गौरव से चौड़ा हो जाता है। छोटे से जिले अंबेंडकर नगर में खड़ा यह युद्ध नायक टैंक आज भी भारतीय सेना के साहस, पराक्रम और अटूट संकल्प का जीवंत प्रतीक बना हुआ है। सीना ताने खड़ा यह युद्ध नायक मानो आज भी सीमाओं की रखवाली कर रहा हो। इसकी मौन उपस्थिति उन रणभूमियों की याद दिलाती है, जहां भारतीय सेना ने दुश्मनों को करारा जवाब देकर इतिहास रचा था। यह टैंक सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि शौर्य, बलिदान और विजय का जीवंत प्रतीक है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह आज भी अपने गौरवशाली इतिहास की गाथा स्वयं गुनगुना रहा हो और आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दे रहा हो कि देश की रक्षा सर्वोपरि है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

टी-55 टैंक का निर्माण कब हुआ था?
टी-55 टैंक का निर्माण शीत युद्ध के दौर में हुआ था।
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