भक्ति कोई बाहरी कर्मकांड नहीं, परम तत्व से संबंध की अवस्था : स्वामी निरंजनानंद
मुंगेर के संन्यास पीठ में हुए लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के तीसरे दिन परमहंस स्वामी निरंजनानंद ने भक्ति के वास्तविक अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भक्ति केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि परम तत्व के साथ संबंध स्थापित करने की अवस्था है। साधना करते समय व्यक्ति को अपेक्षाओं से मुक्त रहने की आवश्यकता है।

मुंगेर, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। योग विद्यालय के पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में आयोजित लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के तीसरे दिन गुरुवार को परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भक्ति के स्वरूप और उसके वास्तविक अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भक्ति केवल कोई पद्धति या मार्ग नहीं, बल्कि जीवन, मन और चेतना की वह अवस्था है, जिसमें मनुष्य परम तत्व के साथ संबंध स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि, इन दिनों भक्ति, भावनाओं की शुद्धता और अंत:करण के परिष्कार की चर्चा हो रही है। भक्ति का अर्थ है परम के साथ संबंध स्थापित करना। जिस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं, उसी प्रकार परम तत्व तक पहुंचने के भी अनेक मार्ग हैं।
ये मार्ग साधक के लिए सहायक हैं, लेकिन स्वयं भक्ति नहीं हैं। भक्ति इन मार्गों से आगे की चेतना की अवस्था है। स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि भक्ति और भक्ति मार्ग को एक मान लेना भक्ति की मूल भावना को सीमित कर देना है। भक्ति योग जीवन की अपनी साधना है। यह किसी एक धर्म, संप्रदाय अथवा बाहरी कर्मकांड से बंधी हुई नहीं है। जब मनुष्य अपेक्षाओं से मुक्त होकर साधना करता है और साधना उसके ऊपर हावी होने के बजाय उसके जीवन को सहज बनाती है, तब भक्ति का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। उन्होंने कहा कि सामान्यतः मनुष्य साधना करता है, लेकिन धीरे-धीरे साधना ही मनुष्य पर हावी हो जाती है। साधना साधक को स्वतंत्र करने के बजाय यदि उसे किसी आग्रह, अपेक्षा अथवा प्रदर्शन से बांध दे तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। भक्ति वह स्थिति है, जिसमें साधक अपनी अपेक्षाओं से मुक्त होकर परम के साथ संबंध स्थापित करता है। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि, भक्ति किसी बाहरी दिखावे की मोहताज नहीं है। वह स्वतंत्र है। संतों का सत्संग उसके मार्ग को सहज और सरल बना देता है। जीवन के संघर्षों और उतार-चढ़ाव के बीच मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए मनुष्य को प्रेमभाव के साथ प्रभु का स्मरण करना चाहिए। लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के तीसरे दिन वैदिक अनुष्ठान के साथ संकीर्तन का भी आयोजन हुआ। ‘हे ईश्वर, हे परमात्मा, अंतर्यामी तुझको प्रणाम’ के साथ धरती, सूर्य, चंद्रमा, नदियों और सागर को प्रणाम करने वाले संकीर्तन ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।


