‘केस रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझकर करें हाईकोर्ट’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालयों को मुकदमा रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए। हाईकोर्ट को प्राथमिकी रद्द करने की मांग पर विचार करते समय मिनी ट्रायल नहीं करना चाहिए। कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा 6 प्राथमिकी रद्द करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि उच्च न्यायालयों को मुकदमा रद्द करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल बहुत ही सोच-समझकर और कभी-कभार ही करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट प्राथमिकी रद्द करने की मांग पर विचार करते समय मुकदमे का मिनी ट्रायल नहीं कर सकते। जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर यह फैसला दिया। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोपों में कर्नाटक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर दर्ज 6 प्राथमिकी रद्द कर दी थी। पीठ ने कहा कि यह तय कानून द्वारा स्थापित सिद्धांत है कि उच्च न्यायालयों को दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। जस्टिस करोल ने फैसले में कहा गया कि जब कोई हाईकोर्ट प्राथमिकी रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा हो, तो उसे जांच से जुड़ी सामग्री के बारे में गैर-जरूरी छानबीन करने से बचना चाहिए। फैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट को बस यह देखना होता है कि क्या पहली नजर में प्राथमिकी के तथ्यों से किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है या नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राथमिकी रद्द करने की मांग के शुरुआती चरण में ही हाईकोर्ट द्वारा ‘मुकदमे का मिनी-ट्रायल’ नहीं किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने दायरे से बाहर जाकर काम किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में सीआरपीसी की धारा-482 के तहत याचिका पर विचार करने के दायरे से बाहर जाकर काम किया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दो अहम बातों पर ध्यान दिया था, पहला प्राथमिकी दर्ज करने में देरी और दूसरा पैसे की मांग या वसूली का कोई सबूत न होना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैर-कानूनी तरीके से पैसे या फायदे की मांग और उसकी वसूली का सबूत न होना, बरी होने का तो आधार बन सकता है लेकिन, यह प्राथमिकी रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा छह प्राथमिकी रद्द करने का फैसला रद्द कर दिया।
यह है मामला
कर्नाटक पुलिस ने वर्ष 2020 में बेंगलुरु की सेंट्रल क्राइम ब्रांच के सहायक पुलिस आयुक्त प्रभु शंकर और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण रोकथाम अधिनियम (पीसी एक्ट) एवं अन्य धाराओं में 6 प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके बाद, आरोपी पुलिस अधिकारी प्रभु शंकर और इंस्पेक्टर निरंजन कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दर्ज प्राथमिकियों को रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने सितंबर, 2021 में सभी पक्षों को सुनने के बाद यह कहते हुए दर्ज प्राथमिकियां रद्द कर दी।
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