शादीशुदा बेटी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने से नहीं कर सकते इनकार- सुप्रीम कोर्ट
प्रभात कुमार नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसले में कहा है

प्रभात कुमार नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुकंपा के आधार पर शादीशुदा बेटी भी नौकरी पाने की हकदार है। शीर्ष अदालत ने अनुकंपा के आधार पर शादीशुदा बेटी को नौकरी के लिए अयोग्य मानने की नीति को रद्द करते हुए यह फैसला दिया है।
महत्वपूर्ण निर्णय
जस्टिस एमएम सुंदरेश और पीबी वराले की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि ‘अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के लिए तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियों को ही योग्य मानने और शादीशुदा बेटियों को अयोग्य मानने की सरकार की नीति पूरी तरह से गलत है और यह समानता के अधिक का हनन करता है। शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा कि सरकार की नीति में बेटा-बेटियों के बीच इस तरह का वर्गीकरण असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि ‘शीर्ष अदालत ने हमेशा से यह माना है कि बेटी और बेटे के बीच फर्क करने वाला कोई भी वर्गीकरण असंवैधानिक है। इसमें कहा गया है कि बिहार सरकार की नीति को देखने पर हमें लगता है कि सिर्फ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटी तक योग्यता सीमित करने वाला वर्गीकरण कानून की नजर में अनुचित और गलत है।’
बिहार सरकार की नीति का निरस्तीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा कर्मचारी की मौत होने पर परिजनों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के लिए 10 दिसंबर, 2014 की जारी नीति की उस शर्त को रद्द कर दिया, जिसमें शादीशुदा बेटी को नौकरी के लिए अयोग्य माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने शायरा खातून की याचिका पर यह फैसला दिया है। उन्होंने अपने पिता की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी मांगी थी, लेकिन राज्य सरकार ने इस आधार पर नौकरी देने से इनकार कर दिया था कि वह न तो तलाकशुदा और न ही पति ने उन्हें छोड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को महिला को आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे और योग्य पाई जाती है तो उन्हें नौकरी दें।
शादी के बाद बेटी से मायका छोड़ने की धारणा
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि शादीशुदा बेटी से आमतौर पर शादी के बाद अपना मायका छोड़ने की उम्मीद की जाती है। पीठ ने कहा कि कानून में ऐसी धारणा की कोई जगह नहीं है। फैसले में कहा गया कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं हो सकती कि शादी के बाद बेटी अपने मायके से रिश्ते तोड़ लेती है और अपने ससुराल में पति के साथ रहती है।’ सुप्रीम कोर्ट पटना उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ शायरा खातून की अपील पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने शादीशुदा होने के चलते अपीलकर्ता को पिता की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने से इनकार के राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया था। अधिकारियों ने दो आधारों पर यह फैसला लिया था: अपीलकर्ता के मामा द्वारा कथित तौर पर जताई गई आपत्ति और बिहार सरकार की 2014 की पॉलिसी, जिसके तहत सिर्फ़ तलाकशुदा या पति द्वारा छोड़ी गई बेटियां ही दया के आधार पर नौकरी के लिए योग्य थीं। बिहार सरकार ने कहा था कि अपील में अनुकंपा पर नौकरी देने के लिए जारी नीति को ही चुनौती नहीं दी गई है और नौकरी नीति के तहत ही दी जाती है और यह कोई अधिकार नहीं है।
तकनीकी आधार पर नौकरी से इनकार
बहुत तकनीकि आधार पर नौकरी से इनकार करना गलता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकार को अनुकंपा पर नौकरी की मांग वाली अर्जी पर विचार करते समय बहुत ज्यादा तकनीकी रवैया अपनाकर उसके दावे पर विचार करने से इनकार नहीं करना चाहिए। पीठ ने कहा कि ‘किसी भी स्थिति में, बहुत अधिक तकनीकी रवैया अपनाना अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के दावे पर विचार करने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।’


