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हिंदी न्यूज़ देश400 साल से है ताजमहल, इसे वहीं रहने दो...सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की इतिहास बदलने की मांग वाली याचिका

400 साल से है ताजमहल, इसे वहीं रहने दो...सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की इतिहास बदलने की मांग वाली याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पिछले 400 साल से ताजमहल जहां है उसे वहीं रहने दो। 400 साल के बाद इतिहास फिर से नहीं खोला जा सकता।

400 साल से है ताजमहल, इसे वहीं रहने दो...सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की इतिहास बदलने की मांग वाली याचिका
Ankit Ojhaएजेंसियां,नई दिल्लीTue, 06 Dec 2022 09:49 AM

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सुप्रीम कोर्ट ने ताजमहल के इतिहास को दोबारा लिखवाने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा है कि 400 साल पुराने इतिहास को दोबारा नहीं खोलवाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, '400 साल के बाद तबकुछ नहीं बदला जा सकता है।' इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका को खारिज करते हुए इस तरह की पीआईएल फाइल ना करने की चेतावनी भी दी है। एक याचिका में श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र को परमात्मा घोषित करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। 

जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की बेंच ने याचिकाकर्ता यूएन दुलाई से कहा कि देश के सभी नागरिकों को संविधान के हिसाब से अपना-अपना भगवान और धर्म मानने का अधिकार है। भारत एक सेक्युलर देश है और किसी को भी इस तरह की याचिका की अनुमति नहीं दी जा सकती जो किसी विशेष को ही परमात्मा घोषित करने की मांग करता है। 

ताजमहल के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कोई जनहित याचिका नहीं बल्कि केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की याचिकाओं से कोर्ट का समय जाया किया जाता है। इसके बाद ही ऐडवोकेट बारुन कुमार सिन्हा ने डॉ. सच्चिदानंद पांडेय की याचिका पर बहस शुरू की। उन्होंने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को निर्देश दिया जाए कि वह ताजमहल का सर्वे करे और बताए कि यहां मुगलकाल की इमारत से पहले कौन सी इमारत हुआ करती थी। 

सिन्हा ने कहा कहा एएसआई की रिपोर्ट के बाद किताबों में छपने वाली ताजमहल की तस्वीर मे भी परिवर्तन किया जाना चाहिए। बेंच ने कहा, पीआईएल का मतलब यह नहीं है कि फिर से जांच शुरू कर दी जाए। ताजमहल वहां 400 साल से है और इसे वहीं रहने दो। इस मामले में फैसले एएसआई को ही करने दिया जाए। हर मामले में कोर्ट को खींचना जरूरी नहीं है। 400 साल के बाद सबकुछ नहीं खोला जा सकता। अदालत की पुरातत्व में कोई विशेषज्ञता भी नहीं है।