थाने में आग लगा देने भर से यूएपीए लागू नहीं होता : सुप्रीम कोर्ट
2024 के हल्द्वानी हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए उत्तराखंड सरकार से पूछा कि केवल थाने में आग लगाने पर कैसे यूएपीए लागू किया जा सकता है। जमानत के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मामले में ठोस कारणों के बिना दखल की आवश्यकता नहीं है।

वर्ष 2024 के हल्द्वानी हिंसा मामले में आतंकवाद निरोधक कानून गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) को लागू किए जाने पर गंभीर चिंता जाहिर की। शीर्ष अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए उत्तराखंड सरकार से पूछा कि भीड़ द्वारा थाने में आग लगा देने भर से ‘यूएपीए’ कैसे लागू हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने उत्तराखंड सरकार की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। राज्य सरकार ने वर्ष 2024 के हल्द्वानी हिंसा के आरोपी अब्दुल मलिक को हाईकोर्ट से मिली जमानत को चुनौती दी थी। पीठ ने मलिक को मिली जमानत बहाल रखते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि भले ही फैसले में हाईकोर्ट का तर्क अधूरा रहा हो, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले में दखल देने का कोई ठोस कारण नहीं है। उत्तराखंड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि हाईकोर्ट ने बिना ठोस कारण बताए आरोपी मलिक को जमानत दे दी। भाटिया ने मलिक की जमानत रद्द करने की मांग की। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने फैसला करते समय यूएपीए की धारा 43डी (5) के तहत कड़ी शर्तों पर विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि आगजनी और पुलिस स्टेशन पर पेट्रोल बम फेंकने जैसी घटनाएं भी हुई है। इसके बाद न्यायमूर्ति बागची ने मामले में यूएपीए लागू किए जाने पर सवाल उठाया। ‘यदि कोई भीड़ जाकर पुलिस स्टेशन जला देती है, तो क्या उस पर सीधे आतंकवाद निरोधक कानून ‘यूएपीए’ लागू हो जाएगा? जब भाटिया ने कहा कि अगर सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो तो यूएपीए लागू होता है। इसके बाद न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि ‘सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा’ के बीच अंतर है। उन्होंने कहा कि इस अदालत को मामले में यूएपीए की धाराएं लागू करने पर गंभीर संदेह है। इसलिए हम हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं और इसे खारिज कर रहे हैं।
सीजेआई ने भी दखल देने से इनकार किया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी जमानत आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए अपीलीय दखल की जरूरत नहीं है कि हाईकोर्ट का तर्क अधूरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इन तथ्यों में, हमें वास्तव में हाईकोर्ट से विस्तृत आदेश की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि वह दो साल से हिरासत में था। भले ही गलत कारण से जमानत दी गई हो, हमें दखल नहीं देना चाहिए।
मामला इतना ही गंभीर था तो अब तक सजा हो जानी चाहिए थी : जस्टिस बागची
मामले की सुनवाई के दौरान बार-बार राज्य सरकार की ओर गंभीर आरोप होने की दलील दिए जाने पर जस्टिस बागची ने कहा कि यदि आरोप उतने ही गंभीर थे, जितना आप (राज्य सरकार) दावा कर रहे हैं, तो अब तक ट्रायल पूरा कर आरोपी सजा हो जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस का मनोबल गिरना आपकी चिंता है, तो आपको दो साल में सजा दिलवा देनी चाहिए थी। आप बुरी तरह विफल रहे हैं।’


