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चुनावी रेवड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, वकील ने क्यों सुनाया श्रीलंका की बर्बादी का किस्सा

तीन जजों की पीठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय और दूसरों की ओर से दायर याचिकाओं पर आज सुनवाई कर रही थी। इनमें इलेक्शन के दौरान पार्टियों की ओर से इस तरह के वादों का विरोध किया गया है।

चुनावी रेवड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, वकील ने क्यों सुनाया श्रीलंका की बर्बादी का किस्सा
Niteesh Kumarअब्राहम थॉमस, हिन्दुस्तान टाइम्स,नई दिल्लीWed, 22 Nov 2023 11:04 PM
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सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ओर से चुनाव पूर्व मुफ्त उपहार देने के वादे को भ्रष्ट आचरण बताया। एससी ने बुधवार को कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत यह रिश्वत है जो चुनाव को अमान्य घोषित करने का आधार है। तीन न्यायाधीशों की पीठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय और दूसरों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें इलेक्शन के दौरान पार्टियों की ओर से इस तरह के वादों का विरोध किया गया है। याचिकाओं में चुनाव आयोग को इन पार्टियों के चुनाव चिह्नों को जब्त करने और उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की गई है। 

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील विजय हंसारिया पेश हुए। उन्होंने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार और अन्य के मामले में SC के 2013 में दिए गए फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है। इस दौरान अदालत ने कहा था कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 में दिए गए मापदंडों पर विचार किया गया। इसके बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंची कि चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वादों को भ्रष्ट आचरण घोषित करने के लिए धारा 123 के तहत नहीं पढ़ा जा सकता है।

'सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला नहीं बताता सही कानून' 
हंसारिया ने कहा कि सुब्रमण्यम बालाजी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही कानून नहीं बनाता है। उन्होंने कहा, 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123 के तहत रिश्वत को भ्रष्ट आचरण माना जाता है। रिश्वत शब्द को किसी उम्मीदवार, उसके एजेंट या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से किसी उम्मीदवार या उसके चुनाव एजेंट की सहमति से किसी उपहार, प्रस्ताव या वादे के रूप में परिभाषित किया गया है। इसका उद्देश्य किसी निर्वाचक को उनकी उम्मीदवारी के लिए पुरस्कार के रूप में प्रेरित करना है।'

विजय हंसारिया ने श्रीलंका का दिया उदाहरण
सीनियर वकील विजय हंसारिया ने श्रीलंका का भी उदाहरण दिया जो दिवालिया हो गया। उन्होंने श्रीलंकाई शीर्ष अदालत के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें कहा गया कि अगर राजनीतिक प्रशासन मुफ्तखोरी को रोकने के लिए समय पर कदम उठाता तो देश को इससे बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल मुफ्त चीजों के लिए किया जाता है और सत्ताधारी पार्टी ऐसे वादे करने के लिए बेहतर स्थिति में है। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दलों ने इन याचिकाओं का विरोध किया है। AAP की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा कि ये याचिकाएं राजनीतिक दलों और उनके कल्याण कार्यक्रमों को निशाना बनाती हैं।
(एजेंसी इनपुट के साथ)

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