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HTLS 2023: जनता की अदालत है भारत का सुप्रीम कोर्ट, CJI चंद्रचूड़ ने की अमेरिका के SC से तुलना

CJI ने यह भी कहा कि जजों को संवैधानिक नैतिकता द्वारा निर्देशित किया जाता है, न कि सार्वजनिक नैतिकता द्वारा। उन्होंने भाईचारा, मानवीय गरिमा, व्यक्तिगत नैतिकता और समानता जैसे मूल्यों की भी बात कही।

HTLS 2023: जनता की अदालत है भारत का सुप्रीम कोर्ट, CJI चंद्रचूड़ ने की अमेरिका के SC से तुलना
Himanshu Jhaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्ली।Sat, 04 Nov 2023 11:26 AM
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HTLS 2023: भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भारत के सुप्रीम कोर्ट की तुलना अमेरिका की सर्वोच्च अदालत से करते हुए इसे जनता की अदलात करार दिया है। उनका कहना है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट एक साल में लगभग 80 मामलों का निपटारा करता है, जबकि इस साल भारत के सुप्रीम कोर्ट ने लोगों की सेवा करने की अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हुए 72,000 मामलों का निपटारा किया है। उन्होंने एचटी लीडरशिप समिट 2023 के पांचवें और अंतिम दिन के सत्र को संबोधित करते हुए ये बातें कही हैं। 

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि जजों को संवैधानिक नैतिकता द्वारा निर्देशित किया जाता है, न कि सार्वजनिक नैतिकता द्वारा। उन्होंने भाईचारा, मानवीय गरिमा, व्यक्तिगत नैतिकता और समानता जैसे मूल्यों की भी बात कही।

जजों के रिटायरमेंट पर क्या बोले?
चंद्रचूड़ ने अमेरिका और भारत के सुप्रीम कोर्ट की तुलना करते हुए जजों की सेवानिवृत्ति की आयु पर भी अपना दृष्टिकोण साझा किया। आपको बता दें कि अमेरिकी न्यायिय प्रणाली में जजों के लिए रिटायरमें की कोई उम्र नहीं है। वहीं, भारत में जज रिटायर होते हैं। चीप जस्टिस ने कहा, ''मुझे लगता है कि जजों को रिटायर होना चाहिए। मुझे लगता है कि मनुष्यों पर उनकी स्वयं की गलतियों की जिम्मेदारी डालना बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। जज इंसान होते हैं। उनमें गलतियां होने की संभावना बनी रहती है। दायित्व आने वाली पीढ़ियों को सौंपना महत्वपूर्ण हो जाता है।"

अदालतों में कैसे बढ़ेगी पिछड़ों और महिलाओं की संख्या
सीनियर के चैंबर में प्रवेश पाने के लिए भी एक अनौपचारिक प्रक्रिया है। ऐसे में बहुत सारे लोग आगे नहीं बढ़ पाते। लेकिन एक अच्छी बात बताना चाहूंगा। पूरे भारत में जिला स्तर की अदालतों में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की नियुक्ति हो रही है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की जिला अदालतों में 120 में से 70 महिलाओं की नियुक्ति होती है। जब लॉ फर्म में महिलाओं की नियुक्ति होती है तो एक माइंडसेट होती है कि महिलाओं पर परिवार की भी जिम्मेदारी होती है, बच्चे भी पालने होते हैं। जब तक हम इस सोच को नहीं बदलेंगे तब तक सुधार संभव नहीं है।

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