पार्श्वनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के खाते फ्रीज
सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ डेवलपर्स के बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए और निदेशकों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए। कोर्ट ने बुजुर्गों की गृह कब्ज़े की लंबी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए यह आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने हरियाणा प्रशासन की मिलीभगत की चिंता जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पार्श्वनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए और कंपनी के अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए। कोर्ट ने यह कदम बुजुर्गों की अपने घरों का कब्जा पाने के लिए 20 साल की लंबी लड़ाई पर ध्यान देते हुए उठाया। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने नियामिकी प्राधिकरणों की ‘सुस्ती’ पर गहरी चिंता जताई और हरियाणा राज्य प्रशासन और बिल्डर के बीच ‘मिलीभगत’ का संकेत दिया। पीठ ने पार्श्वनाथ हेसा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, पार्श्वनाथ डेवलपर्स लिमिटेड और उनके प्रबंध निदेशकों और निदेशकों के निजी बैंक अकाउंट को तुरंत प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दिया। पीठ ने संबंधित कंपनियों के निदेशकों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए। सीजेआई ने ने चेतावनी दी कि अगर वे अगली तारीख पर पेश नहीं हुए, तो उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाएंगे। पीठ ने बिल्डर को अगले आदेश तक किसी तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने या किसी तीसरे पक्ष को कब्जा सौंपने से भी रोक दिया।
यह था मामला
यह मामला रीता टिक्कू (जो कैंसर से ठीक हुई हैं) और लोकेश टिक्कू की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने गुरुग्राम के सेक्टर-53 में ‘पार्श्वनाथ एक्सोटिका’ परियोजना में अपनी जीवन भर की बचत निवेश की थी।
रेरा के आदेशों का पालन भी नहीं किया
याचिकाकर्ताओं ने पहले 2021 में हरियाणा रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) से अपने पक्ष में आदेश हासिल किए थे, जिसमें मुआवजे का आदेश दिया गया था। हालांकि, बिल्डर ने न तो आदेशों को चुनौती दी और न ही उनका पालन किया। सीजेआई ने कहा कि आदेशों को लागू करने की प्रक्रिया बेकार साबित हुई है। उन्होंने कहा कि जब हरियाणा रेरा ने गिरफ्तारी वारंट जारी किए, तब भी उन्हें कभी लागू नहीं किया गया।
यह था मामला
याचिकाकर्ताओं को 2006 में आवासीय इकाईयां (फ्लैट) इकाइयां आवंटित किए गए थे और 2007 की शुरुआत में फ्लैट खरीदार समझौता साइन किया गया था। लगभग 1.78 करोड़ रुपये की पूरी कीमत चुकाने के बावजूद, (कब्जा जो मूल रूप से 2013 में मिलना था) अभी तक नहीं मिला। दो दशक बाद भी परियोजना अधूरी है।


