‘पुलिस बर्बरता के खिलाफ गठित समिति का पुनर्गठन नहीं होगा’
सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक मामले में जांच के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति का पुनर्गठन करने से इनकार कर दिया। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि समिति उनकी देखरेख में काम करेगी। याचिकाकर्ताओं ने समिति के एक सदस्य पर हितों के टकराव का आरोप लगाया, लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पेपर लीक प्रदर्शन में आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस बर्बरता और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा की जांच को गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) का पुनर्गठन करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अगुवाई में पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की थी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने साफ कर दिया कि वह इस धारणा पर आगे नहीं बढ़ेगी कि उसके द्वारा गठित कमेटी पक्षपाती है। सीजेआई ने कहा कि समिति हमारा ही एक हिस्सा है। हम किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं होंगे। यह समिति हमारी (सुप्रीम कोर्ट) देखरेख में काम करेगी। हम इसका पुनर्गठन नहीं करेंगे। इस कमेटी को काम करने दें, हम देखेंगे। हम भाग नहीं रहे हैं। अगर किसी को लगता है कि समिति ने कहीं कुछ गलत किया है, तो हमें बताएं। हम खुली सुनवाई करेंगे। इससे पहले समिति के पुनर्गठन की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ से कहा कि एक समिति सदस्य जो पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक थे, ‘हितों के टकराव’ की स्थिति में है क्योंकि वे एक उच्च अधिकारी के करीबी दोस्त थे, जिनकी जांच होने की संभावना है। वरिष्ठ एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अधिवक्ता भूषण की दलीलों का समर्थन किया। वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने पीठ से कहा कि हमारी पहली मांग यह है कि चूंकि समिति को स्वतंत्र रूप से काम करना है, इसलिए इसमें एक अलग न्याय मित्र और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड होना चाहिए। समिति का प्रतिनिधित्व सरकारी वकील के माध्यम से नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन की इन दलीलों का विरोध किया और पीठ से ऐसे आरोपों को नजरअंदाज करने को कहा। मेहता ने कहा कि उनके (याचिकाकर्ता के वकीलों ) अनुसार, एक या दो लोगों को छोड़कर पूरा देश बेईमान है。
समिति के चयन पर सीजेआई का स्पष्टीकरण
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हमने समिति में मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक को इसलिए चुना था क्योंकि वे पूर्वोत्तर राज्य के डीजीपी थे और इसलिए मुख्य भूमिका की राजनीतिक पार्टियों के करीब होने की संभावना कम थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह एक आदेश पारित करेगी जिसमें सार्वजनिक नोटिस और उस नोटिस पर प्रतिक्रिया की व्यवस्था होगी। जो कोई भी समिति के सामने पेश होना चाहता है, उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार होगा। समिति उन पर विचार करेगी। पीठ ने कहा कि समिति के सदस्य सचिव, एक तरह से, रिकॉर्ड के कस्टोडियन होंगे और पूरी सामग्री कमेटी के सामने रखेंगे। आम तौर पर, यह कोई रिटायर्ड जिला जज या कोई अन्य न्यायिक अधिकारी हो सकता है।
पक्षपात का अनुमान स्वीकार्य नहीं: जस्टिस बागची
जब वकीलों ने बार-बार समिति के पुनर्गठन पर जोर दिया तो, जस्टिस बागची ने कहा कि हम समिति के उस सदस्य के बारे में आपकी आपत्तियों पर विचार करेंगे। लेकिन यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाली और हमारे द्वारा चुनी गई समिति के किसी सदस्य के बारे में पहले से ही पक्षपात का अनुमान लगाया जाए, यह बात हमें स्वीकार्य नहीं है।


