‘कम मामलों वाले राज्यों में जिला उपभोक्ता आयोगों का पुनर्गठन हो’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन राज्यों में उपभोक्ता मामलों की लंबित संख्या 1,000 से कम है, वे कुछ जिला उपभोक्ता आयोगों का पुनर्गठन कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए हाईकोर्ट की मंजूरी अनिवार्य होगी। अदालत उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली की निगरानी कर रही है और निर्देश दिया है कि सभी राज्य फरवरी में दिए गए निर्देशों का पालन करें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन राज्यों में उपभोक्ता मामलों की लंबित संख्या 1,000 से कम है, वे जरूरत के अनुसार कुछ जिला उपभोक्ता आयोग (जिला उपभोक्ता फोरम) का पुनर्गठन कर सकते हैं। हालांकि, ऐसा करने से पहले संबंधित हाईकोर्ट की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पीठ ने 22 जुलाई को पारित एक आदेश में यह निर्देश जारी किया। पीठ देशभर के उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली, नियुक्तियों, सेवा शर्तों और बुनियादी सुविधाओं की निगरानी कर रही है।
उपभोक्ता आयोग का पुनर्गठन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन राज्यों में कुल लंबित उपभोक्ता मामले 1,000 से कम हैं, वहां कुछ जिला उपभोक्ता आयोगों को बंद करके उनके मामलों की सुनवाई मौजूदा न्यायिक अधिकारियों को सौंपी जा सकती है। लेकिन इसके लिए संबंधित हाईकोर्ट की पहले से सहमति जरूरी होगी।
अभियान और पालन
यह स्पष्टीकरण पीठ के उस अभियान के दौरान दिया गया है, जिसमें वह यह सुनिश्चित कर रही है कि राज्यों में उपभोक्ता आयोगों के गठन और उनके अध्यक्षों व सदस्यों की सेवा शर्तों को लेकर पहले दिए गए आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 11 फरवरी के आदेश में कहा था कि कई छोटे राज्यों, खासकर पूर्वोत्तर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, ने अदालत को बताया था कि बहुत कम मामलों के बावजूद अलग-अलग उपभोक्ता आयोग चलाना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है।
राज्यों से निर्देश
अदालत ने उस समय अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, गोवा, तथा लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का उदाहरण दिया था, जहां उपभोक्ता मामलों की संख्या बहुत कम थी। पीठ ने यह भी देखा था कि कुछ राज्यों में राज्य उपभोक्ता आयोग का गठन सही तरीके से नहीं हुआ है और वहां हाईकोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज अध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं हैं। पीठ ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे फरवरी में दिए गए निर्देशों का पालन करें और अपने-अपने उपभोक्ता आयोगों के कामकाज के लिए की गई व्यवस्थाओं के बारे में पीठ को सूचित करें।


