न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं हो सकती : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की आलोचना का स्वागत है, लेकिन यह सही मंच पर और तार्किक तरीके से होनी चाहिए। यह टिप्पणी उस समय की गई जब न्यायपालिका ने NCERT की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के संदर्भ को लेकर स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद की। कोर्ट ने सही और जिम्मेदार बातचीत की आवश्यकता पर बल दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ऐसी आलोचना सही मंच पर और निष्पक्ष व तर्कसंगत तरीके से की जानी चाहिए। यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने तब की, जब वे कक्षा 8 की एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के ज़िक्र से जुड़ी स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही को बंद कर रहे थे। शीर्ष अदालत ने कहा कि फर्क आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं, बल्कि जिम्मेदार बातचीत और बिना जानकारी के किए गए दावों के बीच है।
एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है। हालांकि, जरूरी यह है कि ऐसी आलोचना सही मंच के जरिए और निष्पक्ष, तर्कसंगत तरीके से की जाए, न कि बिना पुष्टि के ऐसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर दी जाए जो आसानी से प्रभावित होने वाले बच्चों के लिए हो। पीठ ने 1 सितंबर के अपने आदेश में कहा, जिसकी बातें बाद में सार्वजनिक की गईं।सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिया कि केंद्र द्वारा गठित एक विशेषज्ञ पैनल के सुझावों के आधार पर विवादित अध्याय को बदल दिया गया है। पीठ एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब से जुड़े एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर ‘आपत्तिजनक’ सामग्री थी।


