अदालत की मुख्य जिम्मेदारी है सच का पता लगाना : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय और ठोस सबूतों पर आधारित नहीं था। मामले में आरोपी की पहचान, चोटों की उम्र से संबंधित मेडिकल सबूतों और गवाहों के बयानों में विडंबनाएं पाई गईं।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपी के बीच की लड़ाई से कहीं ज्यादा है। अदालत की मुख्य जिम्मेदारी सच का पता लगाना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है। न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट, दोनों ने ही उस व्यक्ति को दोषी ठहराने और उसकी सजा बरकरार रखने में गंभीर गलती की थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष जिन्हें हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय और ठोस सबूतों पर आधारित है, तथ्यों और कानून, दोनों ही नजरिए से पूरी तरह गलत और टिकने लायक नहीं हैं। आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपी के बीच का टकराव नहीं होता। अदालत की मुख्य जिम्मेदारी सच का पता लगाना और यह पक्का करना है कि दोषी ठहराने का फैसला कानूनी रूप से मान्य और भरोसेमंद सबूतों पर आधारित हो। अदालत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह चुपचाप तमाशबीन बनी रहे, जब आरोपी के दोषी या निर्दोष होने से सीधे जुड़े किसी सबूत पर ध्यान न दिया गया हो。
मामले की अहमियत
पीठ ने कहा कि इस तरह अभियोजन पक्ष के मामले में आरोपी की पहचान को लेकर गंभीर कमियां हैं, साथ ही, चोटों की उम्र से जुड़े मेडिकल सबूत और एफआईआर व अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में बताई गई घटना की कथित समय-सीमा के बीच भारी विरोधाभास है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि वह व्यक्ति नौ साल से ज्यादा समय से हिरासत में है।
यह था मामला
राजस्थान हाईकोर्ट ने पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म मामले में उस व्यक्ति की सजा बरकरार रखा था और उसे उम्रकैद (जब तक वह जीवित रहे, तब तक जेल में रहने) की सजा सुनाई थी। बच्ची के पिता ने 7 दिसंबर, 2016 को अजमेर के केकड़ी पुलिस थाने एफआईआर दर्ज कराई थी।


