फर्जीवाड़े के साथ जज को एफआईआर भेजने में देरी संदेह पैदा करती है : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 49 साल पहले हुई हत्या के मामले में पांच लोगों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि एफआईआर की देरी और उसके प्रामाणिकता पर संदेह के कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा। मामले के दो आरोपियों की पहले ही मौत हो चुकी है।

नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में करीब 49 साल पहले हुई हत्या के एक मामले में सत्र अदालत और हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को एफआईआर प्रति भेजने में देरी महत्वपूर्ण हो जाती है और अगर इसे ‘‘समय से पहले दर्ज करने , पिछली तारीख डालने और मनगढ़ंत कहानी बनाने और रिकॉर्ड के निर्माण’ के आरोपों के साथ जोड़ा जाता है तो संदेह पैदा होता है। इस मामले के दो आरोपियों की पहले ही मौत हो चुकी है।
अदालत का निर्णय
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दाखिल अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है। पीठ ने 64 पन्नों के फैसले में कहा है कि ‘अभियोजन पक्ष जांच में गंभीर विसंगतियों, अस्पष्टीकृत देरी और एफआईआर की प्रामाणिकता पर संदेह के कारण उचित संदेह से परे आरोपियों के खिलाफ अपराध को साबित करने में नाकाम रही है। फैसले में कहा गया, ‘दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को मजिस्ट्रेट के पास भेजने में देरी को अपने आप में अभियोजन मामले के लिए घातक नहीं माना जा सकता है और न ही इस तरह की देरी को अन्यथा विश्वसनीय अभियोजन संस्करण को खारिज करने का एकमात्र आधार बनाया जा सकता है। हालांकि, इसमें कहा गया है कि जहां ‘समय से पहले दर्ज करने , पिछली तारीख डालने और मनगढ़ंत कहानी बनाने के आरोप केवल काल्पनिक नहीं हैं, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों से उन्हें ठोस समर्थन मिलता है और इसके साथ ही ऐसी आसपास की घटनाएं जुड़ी हैं जो जांच की निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा पर वास्तविक संदेह पैदा करती हैं, तब ऐसी देरी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।’
समुदाय के सामने स्थिति
पीठ ने कहा है कि अदालत को अभियोजन मामले की समग्र विश्वसनीयता का परीक्षण करते समय इस तरह की देरी के प्रभाव का अलग-अलग नहीं बल्कि रिकॉर्ड पर लाई गई अन्य परिस्थितियों के साथ संचयी रूप से आकलन करने की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने मामले में दोषसिद्धि के उच्च न्यायालय के फैसले और निचली अदालत द्वारा पारित सजा के आदेश को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ हीरा लाल, राज बक्स और सूबेदार द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार कर करते हुए उन्हें बरी कर दिया। जबकि राज किशोर और देव प्रसाद से संबंधित अपीलें कार्यवाही के दौरान उनकी मृत्यु के बाद समाप्त कर दी गई थीं। जबकि एक सह-अभियुक्त, राम धनी की पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपील के लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई थी。
मामले का इतिहास
यह है मामला यह मामला 28 जून 1977 को गोंडा जिले में हरिहर शरण की हत्या से जुड़ा है। जिला अदालत ने 1981 में छह आरोपियों को हत्या व अन्य आरोपों में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। उच्च न्यायालय ने 2011 में दोषसिद्धि और सजा को को बरकरार रखा, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष वर्तमान अपीलें दायर की गईं।


