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सोलहवीं लोकसभा: सत्तापक्ष की मजबूती ने ही विपक्ष को एकजुट किया

Sixteenth Lok Sabha

सोलहवीं लोकसभा में भाजपा को अपने दम पर बहुमत होने के कारण हमेशा विपक्ष पर भारी रही। विपक्ष कमजोर था। आधिकारिक रूप से कोई विपक्ष का नेता भी नहीं था। इसलिए शुरुआती तीन सालों तक विपक्ष अलग-थलग पड़ा और कमजोर दिखा। लेकिन भाजपा की कई राज्यों में लगातार जीत और संसद में आक्रामकता ने विपक्ष को धीरे-धीरे एकजुट किया। नतीजा यह हुआ कि आखिरी दो सालों में विपक्ष संसद के भीतर और बाहर कई मौकों पर हावी होता दिखा। 

लोकसभा में 1984 के बाद 2014 में किसी दल को अकेले दम पर बहुमत मिला था। भाजपा ने 282 सीटें जीतकर जरूरत से दस सीटें ज्यादा हासिल की। तब एनडीए सीटों को जोड़कर उसका आंकड़ा लोकसभा के भीतर 336 तक पहुंच गया। जबकि समूचे विपक्ष के पास महज 207 सीटें थी। सबसे प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस महज 44 सीटें जीत पाई। यह सदन की सीटों की कुल संख्या का दस फीसदी से भी कम था इसलिए उसे नेता विपक्ष का पद भी नहीं मिल पाया। इसलिए 16वीं लोकसभा को जहां मजबूत सत्तापक्ष के लिए याद किया जाएगा, वहीं कांग्रेस की न्यूनतम सीटों एवं विपक्ष के नेता नहीं होने के लिए भी याद रखा जाएगा। क्योंकि आगे जो स्थितियां बनी रही हैं, उसमें काफी कुछ चीजें बदली हो सकती हैं।

लोकसभा में भाजपा की मजबूती और उसके बाद कई राज्यों में हुए चुनावों में भाजपा की जीत ने विपक्ष को पहले तो हतप्रभ किया। करीब तीन साल विपक्ष को सोचने-समझने में बीते। लेकिन चुनाव निकट आने पर विपक्ष ने एकजुट होने की कोशिश की। आखिर विपक्ष एकजुट हुआ, क्योंकि यह उसके अस्तित्व का सवाल था। सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हालांकि वह गिर गया। दूसरे, राफेल, बेरोजगारी, भगोड़े कारोबारियों आदि मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की भी कोशिश की। लेकिन विपक्ष लोकसभा में तो सरकार के कामकाज में कोई अड़ंगा नहीं लगा पाया। लेकिन उसकी एकजुटता के दो असर हुए। इस एकजुटता ने राज्यसभा में कई विधेयकों को लटका दिया। सत्ता पक्ष को कई मामलों में पीछे हटना पड़ा। सरकार दबाव में दिखी। वहीं संसद के बाहर कई विपक्षी दलों आपस में हाथ मिला लिया।

भाजपा के लिए एक चुनौती यह रही कि 16वीं लोकसभा के करीब पांच साल के कार्यकाल में 27 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें भाजपा कोई नई सीट नहीं जीत पाई। इनमें से 13 सीटें उसकी खुद की थी जिसमें से वह पांच सीटें दोबारा हासिल कर पाई और आठ सीटें हार गई। जबकि तृणमूल ने अपनी चार सीटें, टीआरएस दो, आरजेडी, बीजेडी, एनपीपी, एनपीएफ ने अपनी एक-एक सीटें फिर से हासिल की। सपा ने एक सीट दोबारा जीती और दो सीटें भाजपा से छीनी। रालोद और एनसीपी ने भाजपा से एक-एक सीटें छीनी। जबकि कांग्रेस ने एक सीट दोबारा जीती और चार सीटें भाजपा से छीनी।

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