हमेशा होती है सत्य की विजय, असत्य की नहीं : राजन स्वामी
नुष्य सभी कामनाओं से रहित होकर कृतकृत्य हो जाता है। राजन स्वामी ने कहा कि, अपना दीदार देने के लिए आप मुझे तरसानुष्य सभी कामनाओं से रहित होकर कृतकृत्

सरसावा। नकुड़ रोड स्थित श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ में चल रहे 20वें वार्षिकोत्सव में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा सहित विभिन्न देशों और देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे सुंदरसाथ को राजन स्वामी ने तारतम वाणी का रसपान कराया। उन्होंने कहा कि सर्वदा सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही मोक्ष के मार्ग का विस्तार होता है और सत्य के अनंत स्रोत परमात्मा को प्राप्त कर मनुष्य सभी कामनाओं से रहित होकर कृतकृत्य हो जाता है। राजन स्वामी ने कहा कि, अपना दीदार देने के लिए आप मुझे तरसा रहे हैं तो मैं तरस रही हूं। मुझसे तो कुछ भी नहीं हो सकता।
सारी बातें तो आपके ही हाथों में हैं। अब आप जैसा चाहें, वैसा ही करें। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में सत्य के मार्ग पर चलते हुए परमात्मा की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक धर्म ग्रंथ का आशय मनुष्य मात्र को सन्मार्ग दिखाना होता है। लेकिन जब स्वार्थ अथवा पक्षपातपूर्ण मानसिकता के कारण धर्म ग्रंथों के अर्थ को विकृत कर जनमानस के सामने प्रस्तुत किया जाता है तो इससे समाज में भ्रम और दुख उत्पन्न होता है। इस अवसर पर ज्ञान, समाज और अध्यात्म से जुड़े विभिन्न विषयों पर आधारित चार महत्वपूर्ण पुस्तकों ‘सामाजिक समरसता की ओर’, संदेह से सत्य की ओर, ‘क्रांति धारा’ और ‘सुधा सिंधु’ का विधिवत विमोचन भी किया गया।


