धर्म-अधर्म की पहचान कर्मों से होती है, जाति से नहीं
परसियां चातुर्मास महामहोत्सव में जीयर स्वामी ने माता-पिता के सम्मान और नारायण की आराधना पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि मानव जीवन का उद्देश्य धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का पालन करना है। स्वामी जी ने भगवान परशुराम और श्रीराम के मिलन का प्रसंग सुनाया और कहा कि माता-पिता का सम्मान भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है।

परसियां चातुर्मास महामहोत्सव में बोले जीयर स्वामी, माता-पिता के सम्मान और नारायण की आराधना को बताया मानव जीवन का आधार भगवान के अवतारों की कथाओं में छिपी है मानव जीवन जीने की सीख अत्याचार के विरुद्ध धर्म की स्थापना का दिया संदेश, संयम-शांति जरूरी (पेज चार) भभुआ, नगर संवाददाता। सदर प्रखंड के परसियां स्थित चातुर्मास महामहोत्सव में प्रवचन के दौरान जीयर स्वामी जी महाराज ने मनु परंपरा, भगवान के विभिन्न अवतारों, भगवान परशुराम और श्रीराम के चरित्र तथा माता-पिता के ऋण पर विस्तार से प्रकाश डाला।
जीयर स्वामी की शिक्षाएं
उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा को समझने के लिए मनु परंपरा और उसमें निहित जीवन मूल्यों को समझना जरूरी है। मनु केवल किसी व्यक्ति या ग्रंथ का नाम नहीं, बल्कि मानव जीवन की व्यवस्था, कर्तव्य और धर्मबोध से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा हैं। सत्यव्रत मनु के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने कहा कि मानव जीवन केवल भौतिक सुख के लिए नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और कर्तव्य के पालन के लिए मिला है।
भगवान परशुराम का वर्णन
स्वामी जी ने भगवान परशुराम के जन्म और उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि परशुराम ऋषि परंपरा से जुड़े थे। उनके पिता जमदग्नि ऋषि और माता रेणुका थीं। उन्होंने बताया कि पिता की आज्ञा का पालन करने वाले राम आगे चलकर भगवान परशुराम के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस प्रसंग को तत्कालीन धार्मिक, आध्यात्मिक और संस्कार परंपरा के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
धर्म की स्थापना का संदेश
उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान परशुराम का संघर्ष किसी जाति विशेष के विरुद्ध नहीं था। उन्होंने अत्याचारी और अधर्मी राजाओं के विरुद्ध संघर्ष किया, जिन्होंने सत्ता का दुरुपयोग कर प्रजा पर अत्याचार किया। उन्होंने कहा कि किसी वर्ग में जन्म लेने मात्र से कोई धर्मात्मा या अधर्मी नहीं हो जाता। मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है। परशुराम का चरित्र अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध धर्म की स्थापना का संदेश देता है।
श्रीराम-परशुराम मिलन का प्रसंग
प्रवचन में श्रीराम और परशुराम के मिलन का प्रसंग भी सुनाया गया। स्वामी जी ने बताया कि शिवधनुष टूटने के बाद परशुराम वहां पहुंचे। श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का बोध होने पर उनका भाव बदल गया और उन्होंने श्रीराम के अवतारी स्वरूप को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि भगवान के विभिन्न अवतारों में विरोध नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और परस्पर सम्मान का भाव है।
भारतीय संस्कृति और माता-पिता का सम्मान
स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है। उनके उपकार को कभी भुलाया नहीं जा सकता। बच्चों को माता-पिता के प्रति सम्मान, सेवा और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। परिवार के प्रति जिम्मेदारी और संस्कार ही समाज को मजबूत बनाते हैं।
नारायण की आराधना
उन्होंने कहा कि पूजा, यज्ञ, तप, ज्ञान और योग तभी सार्थक हैं, जब उनका केंद्र भगवान नारायण हों। केवल बाहरी कर्मकांड से साधना पूर्ण नहीं होती। मनुष्य को धर्म और मर्यादा का पालन करते हुए अहंकार, द्वेष और भेदभाव से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कलियुग और महाप्रलय को लेकर फैले भ्रम को दूर करते हुए कहा कि प्राकृतिक आपदाओं को महाप्रलय नहीं कहा जा सकता। भगवान की कथाओं का वास्तविक फल तभी है, जब उनके संदेश को जीवन में उतारा जाए। फोटो- 08 अगस्त भभुआ- 3 कैप्शन- सदर प्रखंड के परसियां स्थित चातुर्मास महामहोत्सव में श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज का प्रवचन सुनते पुरुष श्रद्धालु।


