कुमाऊं में रेशम की खेती से बढ़ रही किसानों की कमाई
- 300 पौधों से सालाना 25 हजार तक अतिरिक्त आय हल्द्वानी, संवाददाता। कुमाऊं मंडल

- 300 पौधों से सालाना 25 हजार तक अतिरिक्त आय हल्द्वानी, संवाददाता। कुमाऊं मंडल में पारंपरिक खेती के साथ रेशम कीट पालन यानी सेरीकल्चर किसानों की आमदनी बढ़ाने का बेहतर जरिया बन रहा है। मंडल के करीब तीन हजार किसान रेशम उत्पादन से जुड़े हैं और कम लागत में अतिरिक्त आय हासिल कर रहे हैं। रेशम विभाग के मुताबिक मंडल में शहतूती रेशम कोया उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में विभाग ने 99,100 किलोग्राम कोया उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जिसमें बसंत फसल के दौरान अब तक 47,808 किलोग्राम उत्पादन हो चुका है।
उत्पादन के आंकड़े
आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में मंडल में 89,652 किलोग्राम कोया उत्पादन हुआ था, जो 2025-26 में बढ़कर 92,572 किलोग्राम पहुंच गया। इस बढ़ते उत्पादन के बीच विभाग अब अधिक किसानों को सेरीकल्चर से जोड़ने की तैयारी में है।
कम लागत और अतिरिक्त आय
रेशम विभाग के उपनिदेशक हेमचंद्र के अनुसार किसानों को रेशम कीट पालन शुरू करने के लिए किसी बड़े निवेश की जरूरत नहीं पड़ती। किसान अपने खेतों की अनुपयोगी मेड़ों पर करीब 300 शहतूत के पौधे लगाकर पारंपरिक फसलों के साथ रेशम उत्पादन कर सकते हैं। इससे सालाना करीब 25 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय हासिल की जा सकती है। खास बात यह है कि इसके लिए किसान को अपनी मुख्य खेती छोड़ने की जरूरत नहीं होती।
सामान्य मौसम और कीट वितरण
मंडल में रेशम उत्पादन के लिए मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर का समय अनुकूल माना जाता है। मानसून सीजन के लिए विभाग एक सितंबर से किसानों को रेशम के कीट वितरित करेगा। कीट मिलने के करीब 15 दिन में कोया तैयार हो जाता है। इसके लिए समय पर शहतूत की पत्तियां उपलब्ध कराने, साफ-सफाई रखने और जरूरत के अनुसार दवा का छिड़काव करना होता है। विभागीय कर्मचारी किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन भी देते हैं।
एमएसपी से बाजार का भरोसा
उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन स्थानीय मंडियों में कोया बाजार उपलब्ध कराता है, जहां देशभर से व्यापारी खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। सरकार ने कोया की गुणवत्ता के आधार पर समर्थन मूल्य तय किया है। ए ग्रेड कोया का एमएसपी 455 रुपये, बी ग्रेड 405 रुपये, सी ग्रेड 300 रुपये और डी ग्रेड 250 रुपये प्रति किलोग्राम है। खुले बाजार में कई बार किसानों को इससे बेहतर कीमत भी मिल जाती है। वहीं बाजार में फसल नहीं बिकने की स्थिति में विभाग तय एमएसपी पर किसानों से कोया खरीद लेता है। इससे रेशम उत्पादन किसानों के लिए कम जोखिम में अतिरिक्त कमाई का विकल्प बन रहा है


