शेरॉन लोवेन की नृत्‍य साधना ने सीमाएं मिटा दीं

हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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शेरॉन लोवेन 1973 में फुलब्राइट छात्रवृत्ति पर मणिपुरी नृत्‍य सीखने भारत आईं थीं। उन्होंने ओडिसी की साधना की और गुरु केलुचरण महापात्र से उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मान प्राप्त किया। उनकी कला अब एक सीमित विधा नहीं, बल्कि भारतीय नृत्य की विविधताओं का प्रतिनिधित्व करती है।

शेरॉन लोवेन की नृत्‍य साधना ने सीमाएं मिटा दीं
शेरॉन लोवेन की नृत्‍य साधना ने सीमाएं मिटा दीं

राजेंद्र शर्मा। ​साल 1973 में फुलब्राइट छात्रवृत्ति पर शेरॉन लोवेन मणिपुरी नृत्‍य सीखने भारत आईं थीं और फिर भारत की ही बन कर रह गईं। शेरॉन लोवेन ने सीखने की शुरुआत मणिपुरी नृत्‍य से की, मयूरभंज छऊ सीखा और 1975 में गुरु केलुचरण महापात्र के सान्निध्य में ओडिसी की साधना आरंभ की। पांच दशकों से अधिक समय बाद आज वह भारतीय शास्त्रीय नृत्य की ऐसी अंतरराष्ट्रीय कलाकार हैं, जिनके लिए ‘विदेशी’ शब्द लगभग अप्रासंगिक हो चुका है।

शेरॉन का नृत्य जीवन

​अमेरिका के डेट्रॉयट में जन्मीं और पांच दशकों से अधिक समय से भारत में रहकर ओडिसी, मणिपुरी और छऊ की साधना करने वाली शेरॉन के लिए ‘विदेशी नृत्यांगना’ कहना अब उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। उन्होंने भारतीय नृत्य को बाहर से नहीं देखा; उसे भीतर से जिया है।

उपाधि और सम्मान

​9 सितंबर 2026 को गुरु केलुचरण महापात्र की जन्मशती के अवसर पर भुवनेश्वर में उन्हें गुरु केलुचरण महापात्र सम्मान से विभूषित किया गया। सृजन द्वारा आयोजित समारोह में उन्हें नृत्य के क्षेत्र में विशिष्ट और आजीवन योगदान के लिए एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया।

गुरु के प्रति श्रद्धांजलि

​इस सम्मान की सबसे सुंदर बात शायद यह है कि यह उसी गुरु के नाम से मिला, जिन्होंने लगभग आधी सदी पहले इस अमेरिकी युवती में वह संभावना देख ली थी, जिसे वह स्वयं भी तब पूरी तरह नहीं पहचानती थीं।

आरंभिक शिक्षा

​1973 में छात्रवृत्ति पर भारत आईं शेरॉन का आरंभिक उद्देश्य ओडिसी नृत्यांगना बनना नहीं था। वह भारत की कलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने आई थीं। मानविकी, ललित कला और एशियाई अध्ययन की पृष्ठभूमि के साथ उन्हें पश्चिमी और आधुनिक नृत्य, मूकाभिनय तथा रंगमंच का भी अनुभव था। भारत में उन्होंने पहले मणिपुरी सीखा, फिर मयूरभंज छऊ की ओर बढ़ीं। 1975 में गुरु केलुचरण महापात्र से हुई मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

गुरु की पहचान

​गुरु ने बहुत जल्दी पहचान लिया कि शेरॉन में सीखने की असाधारण क्षमता है। उनके पूर्व नृत्य-अनुभव ने ओडिसी की जटिल देह-भाषा और लय को समझने में मदद की, लेकिन गुरु ने उस बाहरी दक्षता को नृत्य की आंतरिक संवेदना से जोड़ा। मंगलाचरण, बटु नृत्य, पल्लवी और अभिनय की शिक्षा के साथ शेरॉन धीरे-धीरे ओडिसी के उस संसार में प्रवेश करती गईं, जहाँ शरीर के साथ मन, भाव, कविता, संगीत और अध्यात्म भी साधना का हिस्सा हैं।

शिक्षा का महत्व

​गुरु केलूचरण महापात्रा से नृत्‍य सीखने के क्रम में शेरॉन मंच पर आने को लेकर उतनी जल्दी में नहीं थीं, लेकिन गुरु ने उन्हें वेशभूषा तैयार करवाने और प्रस्तुति देने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शेरॉन की झिझक तोड़ी और उन्हें स्वयं अपनी क्षमता पर विश्वास करना सिखाया। बीते उस समय को याद करते हुए शेरॉन कहती है कि गुरु का प्रेम, प्रोत्साहन और उदारता उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी रही। उन्होंने अपने गुरु को 'पिता से भी बढ़कर' कहा।

अध्ययन का दस्तावेजीकरण

​भारत और अमेरिका के बीच लगातार यात्रा के कारण शेरॉन अपनी शिक्षा को लिखकर सुरक्षित रखती थीं। आरंभ में गुरु कहते थे-पहले नृत्य सीखो, लिखने की चिंता मत करो। लेकिन समय बदला। कभी किसी दूसरी जगह गुरु किसी रचना को थोड़ा अलग ढंग से सिखाते तो वह शेरॉन से कह देते, अपनी लिखी हुई बातें लाओ। जो लिखा कभी गुरु को अनावश्यक लगता था, वही बाद में उनकी रचनाओं और शिक्षण की स्मृति का सहारा बनने लगा। यह एक असाधारण गुरु-शिष्य संबंध का सुंदर प्रमाण था। शेरॉन अब केवल सीख नहीं रही थीं; वह अपने गुरु की कला को स्मृति में सुरक्षित भी कर रही थीं।

प्रमुख शिष्या का स्थान

​1986 के भारत महोत्सव के अमेरिकी दौरे तक शेरॉन गुरु की प्रमुख शिष्या बन चुकी थीं। गुरु केलुचरण महापात्र ने उनके साथ 22 प्रस्तुतियां कीं। इसके बाद उन्होंने शेरॉन के बारे में जो कहा, वह किसी पुरस्कार से कम नहीं था कि वह अब मेरी पांच श्रेष्ठ शिष्याओं में से एक है। मैं उसे संसार में कहीं भी ओडिसी नृत्य-परंपरा का प्रतिनिधित्व करने के लिए बिना किसी संकोच के अनुशंसित कर सकता हूं। शेरॉन ने इस परंपरा को पूरी तरह साध लिया है। गुरु के इन शब्दों ने जैसे शेरॉन की साधना पर अपनी मुहर लगा दी थी।

विविध नृत्य अध्ययन

​शेरॉन की कला ओडिसी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने मणिपुरी और मयूरभंज तथा सरायकेला छऊ का गंभीर अध्ययन किया। विशेष रूप से मयूरभंज छऊ में उन्होंने महिलाओं की एकल प्रस्तुति की संभावनाओं को सामने लाकर इस परंपरा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संस्कृत के साथ ओड़िया, तेलुगु, बांग्ला, मलयालम, तमिल, हिंदी, कश्मीरी और डोगरी जैसी भाषाओं के साहित्य और संगीत से प्रेरित रचनाओं को भी मंच दिया। इससे स्पष्ट है कि उनके लिए भारतीय नृत्य कोई एक सीमित विधा नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं और संस्कृतियों से बना एक विराट संसार है।

शोध और लेखन

​शेरॉन नृत्यांगना होने के साथ अध्येता और लेखिका भी हैं। गुरु केलुचरण महापात्र के जीवन और कला को उन्होंने निकट से देखा और समझा। उनकी पुस्तक ‘नृत्यमय व्यक्तित्व-गुरु केलुचरण महापात्र’ उनके गुरु की कला को समझने और सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। इस अर्थ में वह केवल गुरु की शिष्या नहीं रहीं; गुरु की कला की साक्षी और उसकी स्मृति की संरक्षक भी बनीं।

चलचित्रों में कार्य

​चलचित्रों में भी उन्होंने काम किया और चर्चित तेलुगु चलचित्र ‘स्वर्ण कमलम्’ से जुड़ीं। अपनी संस्था मानसा-सीमाओं से परे कला के माध्यम से वह नृत्य, शिक्षा और सांस्कृतिक संवाद को आगे बढ़ाती रही हैं।

विरासत का निबंधन

​शेरॉन लोवेन ने गुरु से सीखा, गुरु के साथ यात्रा की, गुरु की रचनाओं को मंच पर जिया, उनकी शिक्षाओं को सुरक्षित किया और फिर उस विरासत को आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाने का दायित्व निभाया। इसलिए गुरु की जन्मशती के वर्ष, उसी गुरु के नाम पर मिला यह सम्मान एक सुंदर सांस्कृतिक वृत्त के पूरा होने जैसा है। जिस गुरु ने ओडिसी को ओडिशा की सीमाओं से निकालकर संसार के मंच तक पहुँचाया, उसी गुरु की शिष्या ने जन्म की भौगोलिक सीमा पार करके उस परंपरा को अपना जीवन बना लिया।

​कला अंततः यह नहीं पूछती कि तुम कहां जन्मे हो। वह यह पूछती है-तुमने उसे कितनी सच्चाई से जिया है? शेरॉन लोवेन ने उसे पूरी निष्ठा, विनम्रता और समर्पण से जिया है। इसलिए आज उन्हें केवल गुरु केलुचरण महापात्र की शिष्या कहना पर्याप्त नहीं। वह उस परंपरा की साधिका हैं, जिसकी ज्योति गुरु ने उनके हाथों में सौंपी थी और जिसे वह आज भी अगली पीढ़ियों तक पहुँचा रही हैं।यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है ,यही उनकी सबसे बड़ी साधना है और शायद यही अपने गुरु के प्रति उनकी सबसे सुंदर गुरुदक्षिणा भी।

(राजेंद्र शर्मा की रिपोर्ट)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

✦शेरॉन लोवेन ने किस वर्ष भारत की यात्रा की?−
शेरॉन लोवेन 1973 में भारत आईं थीं।
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