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सियासी सांझ की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ते पवार

नई दिल्ली, हिन्दुस्तान टीम Published By: Malay
Sun, 24 Nov 2019 09:01 AM
सियासी सांझ की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ते पवार

मुश्किलों से उनका पुराना नाता रहा है, लेकिन इस बार मराठा राजनीति के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले शरद चंद्र गोविंदराव पवार के सामने जो स्थितियां हैं वे सबसे अलग हैं। ये हालात उस समय बने हैं जब कुछ ही सप्ताह पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान वे पूरे राज्य में यह कहते घूम रहे थे कि ये उनकी आखिरी चुनावी सक्रियता है। यह लगभग तय माना जा रहा था कि भले ही उनकी विरासत का एक हिस्सा उनकी बेटी सुप्रिया सूले के पास रहेगा लेकिन वे अपनी बागडोर पूरी तरह अपने भतीजे अजित पवार को सौंप देंगे। अजित को काफी समय से पवार परिवार के अगले चिराग की तरह ही देखा जा रहा था। लेकिन चुनाव खत्म होते ही घर का यह चिराग उसमें आग लगने का कारण बन जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था।

अब जब अजित पवार कुछ विधायकों के साथ भाजपा से जा मिले हैं और मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले डाली है तो शरद पवार के सामने एक साथ दो मोर्चे खुल गए हैं। एक तो उन्हें अपनी उस साख और धमक को बचाना है जिसके जिसके लिए वे जाने जाते हैं। दूसरे, जब से देवेंद्र फणनवीस और अजित पवार ने शपथ ली है शरद पवार की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो यह मानते हैं कि यह पूरा खेल शरद पवार का रचा हुआ ही हो सकता है।

शरद पवार शुरू से ही गंठबंधन के खेल की माहिर माने जाते रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र में अपनी पहली सरकार ही कांग्रेस से निकल कर एक गंठबंधन तैयार करते हुए बनाई थी और राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे।

यह भी कहा जाता है कि शरद पवार ऐसे नेता हैं जिनके लोग लगभग हर दल में हैं। यह बात भले ही पूरी तरह सच न हो लेकिन वे ऐसे शख्स तो हैं ही जिनका नाम सभी जगह एक सा स्वीकार्य है। राजनीतिक दलों से ही नहीं उद्योग घरानों से भी उनके अच्छे रिश्ते रहे हैं।

लेकिन शरद पवार को सबसे बड़ी मात उसी खेल में मिली जो उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दांव था। 1999 में जब वे लोकसभा में विपक्ष के नेता थे उन्होंने पीए संगमा और तारिक अनवर के साथ मिलकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया और कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी बनाई। इस दांव के पीछे की सोच यह थी कि लगातार नीचे की ओर जा रही कांग्रेस का एक बड़ा तबका उनके साथ आ मिलेगा और फिर गणित थोड़ा भी उनकी ओर झुका तो देश की सबसे बड़ी कुर्सी के लिए गंठबंधन बनाने में वे कामयाब रहेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं। केंद्र की सत्ता तो छोड़िये महाराष्ट्र में भी उनकी पार्टी का आंकड़ा कांग्रेस से ज्यादा नहीं हो सका। और दिल्ली की सत्ता ने जब करवट ली तो उनकी उम्मीदों के विपरीत चाबी कांग्रेस की हाथ ही आ गई। लेकिन शरद पवार ने व्यवहार कुशलता दिखाई और जल्द ही मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा बन गए।

अब इस 79 वर्षीय मराठा क्षत्रप को अपने गृहक्षेत्र में ताजा लड़ाई तब लड़नी पड़ रही है जब यह माना जा रहा था कि वे जल्द ही सक्रिय राजनीति को अलविदा कहने जा रहे हैं।

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