कटिहार: हर साल आधा दर्जन से अधिक पंचायतों में टूटता है बाढ़ का कहर
कटिहार में बरारी प्रखंड में बाढ़ हर साल हजारों परिवारों के जीवन को प्रभावित कर रही है। पानी से भरे गांवों के लोग सुरक्षित स्थानों पर पलायन करने को मजबूर हैं। बाढ़ से फसलें और रोजी-रोटी प्रभावित होती हैं, और लोगों के सामने कई गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। स्थायी समाधान के अभाव में ग्रामीणों की स्थिति दयनीय है।

कटिहार से शशि रमण की रिपोर्ट बरारी प्रखंड में बाढ़ अब कोई नई आफत नहीं रही, बल्कि हर वर्ष लौटकर आने वाली ऐसी त्रासदी बन गई है, जो हजारों परिवारों की जिंदगी की रफ्तार रोक देती है। सुखासन, दुर्गापुर, विशनपुर, मोहनाचांदपुर, कांतनगर, लक्ष्मीपुर, बकिया सुखाय सहित अन्य पंचायतों में बाढ़ का पानी फैलते ही गांवों की तस्वीर बदल जाती है। घर-आंगन में पानी प्रवेश करने के बाद परिवारों को अपना आशियाना छोड़कर ऊंचे और सुरक्षित स्थानों की तलाश करनी पड़ती है।
बाढ़ की स्थिति
इस बार भी बाढ़ की मार झेल रहे कई परिवार सड़क किनारे और मोहनाचांदपुर के कुंडी पुल पर अपना अस्थायी आशियाना बनाकर रहने को मजबूर हैं। किसी के सिर पर तिरपाल है तो किसी के पास प्लास्टिक की चादर ही सहारा है। खुले आसमान के नीचे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ परिवार दिन-रात गुजार रहे हैं। घर में रखा सामान, अनाज और जरूरी घरेलू सामग्री बचाने की जद्दोजहद के बीच लोगों के सामने भोजन, पेयजल, शौचालय और पशुचारे की समस्या भी खड़ी हो गई है। बाढ़ का पानी सिर्फ घरों में नहीं घुसता, बल्कि लोगों की रोजी-रोटी और भविष्य पर भी असर डालता है। खेतों में पानी भरने से फसलें प्रभावित होती हैं। मजदूरी और छोटे-मोटे रोजगार पर निर्भर परिवारों के सामने आर्थिक संकट गहराने लगता है। आवागमन प्रभावित होने से बाजार और जरूरी सेवाओं तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।मीणों का कहना है कि बाढ़ के दौरान उन्हें अपने घरों से ज्यादा अपने परिवार और पशुओं की चिंता सताती है। सुरक्षित जगह की तलाश में लोग सामान समेटकर सड़क और पुल की ओर निकल जाते हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी जिंदगी सामान्य होने में लंबा समय लग जाता है।
ग्रामीणों की चुनौती
बाढ़ पीड़ित राम कुमार, रोशन यादव, मनोहर कुमार, एशिया देवी सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि प्रत्येक वर्ष उन्हें बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है। बाढ़ आते ही घर-गृहस्थी उजड़ने लगती है और परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे इसी समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन बाढ़ से बचाव के लिए अब तक कोई स्थायी और कारगर विकल्प नहीं निकाला गया है।


