चलते-चलते::चिंताजनक: स्कूलों में जासूसी का नया हथियार बन रहे स्मार्ट चश्मे
या स्मार्ट चश्मे से स्कूल में जासूसी जैसा खेल छात्र स्मार्ट चश्मों से क्लास,

या स्मार्ट चश्मे से स्कूल में जासूसी जैसा खेल
छात्र स्मार्ट चश्मों से क्लास, गलियारों और स्कूल परिसर में लोगों के वीडियो बना रहे
कई बार रिकॉर्ड होने वाले छात्रों को पता ही नहीं चलता कि उनका वीडियो बनाया जा रहा है।
प्रैंक, बुलिंग और असहज करने वाले पलों को रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है।
वाशिंगटन, एजेंसी। तकनीक के इस दौर में कैमरे वाले स्मार्ट ग्लासेस (स्मार्ट चश्मे) निजता और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो डाले गए हैं जिनमें मेटा और रे-बैन के स्मार्ट चश्मों का इस्तेमाल स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र बिना सहमति रिकॉर्डिंग और जासूसी के लिए कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति अमेरिका, भारत सहित दुनिया के कई देशों में बढ़ रही है। इस प्रवृत्ति ने साइबर बुलिंग, प्राइवेसी और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
प्रैंक, बुलिंग को रिकॉर्ड कर रहे
दायरा सिर्फ अनजाने में रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि लड़के इन स्मार्ट चश्मों को पहनकर लोगों का पीछा करते हैं, उनके लुक्स पर तंज कसते हैं और भद्दे प्रैंक्स के वीडियो बना रहे हैं। कई मामलों में, आर्टिस्ट्स के पैंतरों की नकल करते हुए लड़कियों से उनके फोन नंबर मांगने और उन्हें रिकॉर्ड करने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
स्कूलों के सुरक्षित माहौल खत्म हो रहा
विशेषज्ञों के अनुसार, स्मार्ट चश्मों का बढ़ता चलन स्कूलों के सुरक्षित माहौल को खत्म कर रहा है। फ्रेम में छिपे हुए सूक्ष्म कैमरों के कारण किसी के लिए भी यह पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता है कि सामने वाला व्यक्ति उनकी वीडियो बना रहा है या सिर्फ चश्मा पहने खड़ा है। हालांकि, कंपनियों का दावा है कि रिकॉर्डिंग के दौरान चश्मे पर एक छोटी इंडिकेटर लाइट जलती है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इस लाइट को आसानी से छिपाया या बाईपास किया जा सकता है। इसके चलते, यह फीचर जासूसी को रोकने में पूरी तरह से अप्रभावी साबित हो रहा है। कई विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों में स्मार्ट ग्लासेस को अनुमति देना खतरनाक है।
देश-दुनिया में रिकॉर्डिंग के कई मामले
-देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में स्मार्ट ग्लासेस का इस्तेमाल हाई-टेक नकल और जासूसी के लिए किया गया। राजस्थान पुलिस ने इसका खुलासा किया था।
-पुणे में दो इंजीनियरिंग छात्रों को मई में परीक्षा के दौरान मेटा स्मार्ट ग्लास पहने पकड़ा गया था
-हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के दो छात्रों ने मेटा रे-बैन स्मार्ट ग्लासेस में फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर जोड़ा। उन्होंने मेट्रो और सड़कों पर चलते हुए अनजान लोगों के चेहरे स्कैन किए और कुछ ही सेकंड में उनका नाम, घर का पता और फोन नंबर स्क्रीन पर हासिल कर लिया।
विरोध के बाद कंपनियों ने कुछ कदम भी उठाए हैं
ऑटो-कैमरा शटऑफ: मेटा ने सॉफ्टवेयर अपडेट जारी किया है, जिससे अगर लाइट को ढका या क्षतिग्रस्त किया गया, तो चश्मे का कैमरा अपने आप बंद हो जाएगा।
-मेटा और अन्य टेक कंपनियों ने नए हार्डवेयर सर्किट पेटेंट कराए हैं, जो सीधे सर्किट लेवल पर कैमरा और माइक को लॉक कर देते हैं। इसे कोई सॉफ्टवेयर हैक, ऐप या रिमोट अपडेट बाइपास नहीं कर सकता।
-फोटो लेने या वीडियो रिकॉर्ड करने पर चश्मे की फ्रंट एलईडी लाइट जलना अनिवार्य किया गया है और साथ ही एक अलर्ट टोन भी बजता है, ताकि आसपास के लोगों को पता चल सके।
-कंपनियों ने अपने आधिकारिक यूजर गाइडलाइंस में स्पष्ट लिखा है कि स्कूलों, चेंजिंग रूम, वॉशरूम और अस्पतालों जैसे संवेदनशील स्थानों पर चश्मे को स्विच-ऑफ रखा जाए।


