Right to Privacy: Profile of Supreme Court's 9 judges gave verdict on Right to Privacy  - राइट टू प्राइवेसी: कौन हैं वे नौ जज जिन्होंने सुनाया बड़ा फैसला, जानें सबकुछ DA Image

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राइट टू प्राइवेसी: कौन हैं वे नौ जज जिन्होंने सुनाया बड़ा फैसला, जानें सबकुछ 

Profile of Supreme Court's 9 judges gave verdict on Right to Privacy

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर सुनवाई करते हुए इसे नागरिकों का मौलिक अधिकार माना। तीन तलाक पर फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन बाद ही एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जहां सरकार को बड़ा झटका दिया तो वहीं यह बात भी साफ हो गई है कि निजता का अधिकार नागरिकों का एक मूल अधिकार है। सरकार अभी तक इस बात को मानन से इनकार कर देती थी। सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यों वाली बेंच ने यह एतिहासिक फैसला दिया है। जानिए इस फैसले से जुड़े नौ जजों के बारे में सबकुछ। 

चीफ जस्टिस जे एस खेहर
जस्टिस जगदीश सिंह खेहर का जन्म 28 अगस्त 1952 को हुआ था। वर्तमान में वे भारत के 44वें मुख्य न्यायाधीश हैं। 04 जनवरी 2017 को उन्होंने प्रधान न्यायाधीश के पद की शपथ ग्रहण की थी। वे सिख समुदाय से आने वाले उच्चतम न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश हैं।  इससे पहले जस्टिस खेहर ने 1979 में वकालत की शुरुआत की थी। इस दौरान उन्होंने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट तथा उच्चतम न्यायालय में वकालत की। 1992 में इन्हें पंजाब में अतिरिक्त महाधिवक्ता नियुक्त किया गया था। 2009-10 के दौरान इन्हें उत्तराखंड हाईकोर्ट में मु्ख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इसके बाद 2010-11 में इन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त किया गया था। 2011 में इन्हें सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया था और फिर जनवरी 2017 में इन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ दिलाई गई। मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल की ये आखिरी बड़ी सुनवाई मानी जा रही है क्योंकि 28 अगस्त 2017 को वो रिटायर होने वाले हैं। 

न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर
जे चेलामेश्वर का जन्म 23 जून, 1953 को हुआ था। सुप्रीम कोर्ट में जज के पद की शपथ लेने से पूर्व वो केरल और गुहाटी हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद पर रह चुके हैं। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर नियुक्त जे चेलामेश्वर ने मई में सुप्रीम कोर्ट में वाई-फाई की सुविधा न होने को लेकर सवाल उठाया था। जे चेलामेश्वर और फॉली नरीमन की दो जजों की बेंच ने ही इस कानून को निरस्त किया था जिसके तहत पुलिस को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का आदेश था जिसने किसी को कुछ मेल किया हो या कोई इलेक्ट्रॉनिक संदेश दिया हो जिससे किसी को कुछ परेशानी हुई हो। इस आदेश के दौरान दोनों जजों की बेंच ने सेक्शन 66A को ओपन एंडेड और असंवैधानिक करार दिया था।

न्यायमूर्ति एस ए बोबड़े
जस्टिस बोबड़े का जन्म 24 अप्रैल 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था। 1978 में पहली दफा इन्होंने बार काउंसिल के साथ रजिस्टर किया था। 21 सालों तक बॉम्बे हाई कोर्ट के नागपुर बेंच और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की। 29 मार्च, 2000 को बॉम्बे हाई कोर्ट में एडिशनल जज के पद पर नियुक्त किए गए। 2012 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के पद की शपथ ली। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट में जज के पद पर नियुक्त किए गए। 

न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल
जस्टिस आर के अग्रवाल उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इनका जन्म 05 मई, 1953 को हुआ था। 1976 में इन्होंने बार काउंसिल के साथ एडवोकेट के रूप में पंजीकरण करवाया था। भारत सरकार के इनकम टैक्स विभाग के लिए काउंसिल के पद पर भी काम किया। साल 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में परमानेन्ट जज के रूप में नियुक्त किए गए। 2013 में मद्रास हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस का पदभार संभाला और इसी साल कोर्ट के चीफ जस्टिस भी बना दिए गए। इसके बाद साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में जज के पद पर नियुक्त किए गए और वर्तमान में कार्यरत हैं।

न्यायमूर्ति रोहिंगटन फली नरीमन
13 अगस्त 1956 को पैदा हुए रोहिंगटन फली नरीमन को 37 साल की कम उम्र में सुप्रीम कोर्ट में सीनियर काउंसिल के पद पर नियुक्त करने के लिए जस्टिस वेंकटाचलैय्या ने नियम में बदलाव करते हुए 45 की जगह 37 की ही उम्र में उन्हें सीनियर काउंसिल नियुक्त किया गया था। पिछले 35 सालों से लॉ प्रैक्टिस कर रहे हैं और 500 से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट के फैसले इनके नाम पर हैं। इन्हें संवैधानिक और गृह मामलों का एक्सपर्ट माना जाता है।

न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे
अगस्त 1954 में पैदा हुए जस्टिस सप्रे ने साल 1978 में बार काउंसिल में एडवोकेट के तौर पर रजिस्टर हुए थे। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सिविल, लेबर और कंस्टीच्यूशनल मशलों पर प्रैक्टिस कर चुके हैं। 1999 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एडिशनल जज के पद पर नियुक्त किए गए थे और साल 2001 में परमानेन्ट जज का पदभार संभाला था। इसके अलावा राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मणिपुर हाईकोर्ट में भी जज के पद पर कार्यरत रहे हैं। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए। 2019 में ये रिटायर होने वाले हैं। 

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़
13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट में जज के पद पर नियुक्त किए गए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ इससे पहले 2013 से 2016 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद पर कार्यरत रहे हैं। 1998 से 2000 तक एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के पद पर भी कार्यरत रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर से इन्होंने एलएलबी की डिग्री ली थी।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल
दिल्ली के मशहूर मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई करने वाले जस्टिस किशन कौल का जन्म 26 दिसंबर, 1958 को हुआ था। 1979 में इन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन के बाद 1982 में डीयू के ही कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की डिग्री पूरी की। इन्होंने कमर्शियल, सिविल और कंपनी लॉ सहित कई मामलों में दिल्ली हाई कोर्ट सहित सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में लंबे वक्त तक प्रैक्टिस किया है। 1987 से 1999 तक इन्होंने सु्प्रीम कोर्ट में एडवोकेट के तौर पर प्रैक्टिस किया है। साल 2003 में इन्हें दिल्ली हाईकोर्ट में परमानेंट जज के पद पर नियुक्त किया गया था। साल 2013 में इन्हें पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त किया गया था। 2017 के फरवरी में इन्हें सु्प्रीम कोर्ट के जज का पदभार दिया गया था। तब से अब तक वो इस पद पर कार्यरत हैं।

न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर
05 जनवरी, 1958 को जन्मे न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर ने साल 1983 में बार काउंसिल से जुड़े थे। इसके बाद से कर्नाटक हाईकोर्ट में लंबे वक्त तक प्रैक्टिस के बाद इन्हें 2003 में कर्नाटक हाईकोर्ट के एडिशनल जज का पदभार दिया गया था। 2004 में परमानेंट जज के पद पर नियुक्त होने के बाद 2017 के फरवरी महीने में इन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज की जिम्मेवारी दी गई। वर्तमान में वो उच्चतम न्यायालय में कार्यरत हैं।

SC का ऐतिहासिक फैसला: राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार है, निजता की सीमा तय की जा सकती है

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