‘बावन बूटी’ कला को नया जीवन दे रहे बुनकर, महिलाओं की संवर रही आजीविका
बावन बूटी कला का संरक्षण और संवर्धन बुनकरों और महिलाओं की आजीविका को मजबूत कर रहा है। पद्मश्री कपिलदेव प्रसाद के प्रयासों से इस कला को जीआई टैग मिलने से इसकी मांग बढ़ी है। स्थानीय महिलाएं इस कला के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं, और विभिन्न प्रदर्शनियों में भाग ले रही हैं।

‘बावन बूटी’ कला को नया जीवन दे रहे बुनकर, महिलाओं की संवर रही आजीविका ‘बावन बूटी’ कला को नया जीवन दे रहे बुनकर, महिलाओं की संवर रही आजीविका पद्मश्री कपिलदेव प्रसाद के प्रयासों और जीआई टैग से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी मांग जीविका, पंचायत और सहकारी समितियों के संयुक्त प्रयास से सशक्त हो रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था फोटो बुनकर : हस्तकरघा पर कपड़ा तैयार करते बुनकर। बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। नालंदा की धरती अपनी प्राचीन बौद्ध विरासत और विश्वविद्यालय के साथ एक और अनमोल धरोहर को संजोए हुए है ‘बावन बूटी’ हस्तकरघा कला। कमल, शंख, चक्र, स्तूप, वृक्ष, पशु-पक्षी और बौद्ध प्रतीकों से सजी 52 पारंपरिक आकृतियों वाली यह बुनाई लगभग 300 से 400 वर्ष पुरानी परंपरा है। मशीनों के इस युग में भी नालंदा के बसावन बिगहा, नेपुरा, मल्लाह बिगहा, उपरनवां आदि गांवों के बुनकरों ने अपनी इस शिल्पकला को जीवित रखा है। इस कला को नई पहचान और बाजार दिलाने में स्थानीय महिलाओं, जनप्रतिनिधियों, जीविका और बुनकर सहकारी समितियों के संयुक्त प्रयास अब रंग ला रहे हैं। हाल ही में इस कला को जीआई टैग मिलने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग में इजाफा हुआ है।
पद्मश्री कपिलदेव प्रसाद की अमिट देन:
बावन बूटी को राष्ट्रीय पटल पर लाने का मुख्य श्रेय स्व. पद्मश्री कपिलदेव प्रसाद को जाता है। उनके अथक प्रयासों से युवा बुनकरों को प्रशिक्षण मिला और इस कला को व्यापक पहचान प्राप्त हुई। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 2023 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। उनके निधन के बाद भी बसावन बिगहा के बुनकर इस विरासत को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं। बसावन बिगहा स्थित बसावन बिगहा प्राइमरी वीवर्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड वर्ष 1980 से इस परंपरा के संरक्षण, प्रशिक्षण और विपणन का कार्य कर रही है। वर्तमान में सोसाइटी के 124 सदस्य हैं, जिनमें करीब 40 महिलाएं शामिल हैं। सोसाइटी के पास करीब 75 करघे और 50 चरखे संचालित हो रहे हैं।
महिलाएं बन रहीं सशक्त:
बावन बूटी अब ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण का एक मजबूत माध्यम बन चुकी है। वार्ड संख्या-02 की वार्ड सदस्य बेबी देवी खुद एक कुशल बुनकर हैं और वर्षों से अपने परिवार के साथ इस कला से जुड़ी हुई हैं। बेबी देवी ने कश्मीर, कोलकाता, दिल्ली और पटना समेत विभिन्न शहरों की प्रदर्शनियों में भाग लेकर बावन बूटी को नई पहचान दिलाई है। उनका कहना है कि यह सिर्फ बुनाई नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और आजीविका का सवाल है। कई महिलाएं घर बैठे बुनाई कर परिवार की आय बढ़ा रही हैं। एक साधारण साड़ी तैयार करने पर बुनकर को करीब 500 रुपये मिलते हैं, जबकि जटिल डिजाइन वाली साड़ियों पर 1,500 से 5,000 रुपये तक का पारिश्रमिक मिलता है। तैयार माल डाक और कूरियर के जरिए देशभर में ग्राहकों तक पहुंचाया जा रहा है।
सहयोग से मिला नया बाजार
पंचायती राज संस्थाओं , जीविका और पंचायती राज विभाग की सहयोगी संस्था सी-3 (सी-थ्री) ने इन बुनकरों को बाजार से जोड़ने की दिशा में सराहनीय काम किया है। नाबार्ड के सहयोग से बुनकर श्रीनगर, दिल्ली, वाराणसी, रांची और पटना जैसी जगहों पर प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुके हैं।


