प्रेमचंद साहित्य को समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा से जोड़ा
गाजीपुर में अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने मुंसी प्रेमचंद और डॉ. उमाशंकर तिवारी की जयंती मनाई। कवि हरिशंकर पाण्डेय और अन्य ने प्रेमचंद की साहित्यिक योगदान पर बातें की, जिसमें उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को प्राथमिकता दी। डॉ. उमाशंकर के नवगीतों को भारतीय संस्कृति और लोकजीवन की अभिव्यक्ति बताया गया।

गाजीपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ओर से खालिसपुर में मुंसी प्रेमचंद और डॉ. उमाशंकर तिवारी की जयंती पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में कवि हरिशंकर पाण्डेय ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा से जोड़ा। उन्होंने साहित्य को मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। वहीं डॉ. उमाशंकर तिवारी ने नवगीत को लोकजीवन, भारतीय सांस्कृतिक चेतना और समकालीन यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति बनाया। आज जब समाज संवेदनहीनता की चुनौती से जूझ रहा है, तब इन दोनों रचनाकारों का स्मरण हमें अपने सांस्कृतिक दायित्वों का बोध कराता है। डॉ. सन्तोष कुमार तिवारी ने अपने पिता डॉ. उमाशंकर को स्मरण करते हुए कहा कि उनका सम्पूर्ण जीवन साहित्य के प्रति निष्ठा, सादगी और मूल्यबोध का जीवन था।
उन्होंने कभी लोकप्रियता की चिंता नहीं की, बल्कि साहित्यिक गुणवत्ता को ही अपना धर्म माना। उनके नवगीतों में भारतीय ग्राम्य जीवन, लोक-संस्कृति, मानवीय करुणा और समय की बेचैनी एक साथ दिखाई देती है। उनके साहित्य पर जितना लिखा जाएगा, वह उतना ही नया अर्थ देता रहेगा।मंच संचालन करते हुए डॉ. अक्षय पाण्डेय ने कहा कि प्रेमचंद ने भारतीय समाज को उसकी वास्तविक आकृति में देखने की दृष्टि दी। उनका साहित्य हमारे लोकतांत्रिक विवेक का आधार है। कवि गोपाल 'गौरव' ने कहा कि "प्रेमचंद का साहित्य भारतीय जनजीवन का महाकाव्य है। उन्होंने किसान, मजदूर, स्त्री और समाज के उपेक्षित वर्गों को साहित्य में सम्मानजनक स्थान दिया। युवा कवि मनोज यादव 'बेफिक्र' ने कहा कि आज साहित्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की है। प्रेमचंद और डॉ. उमाशंकर तिवारी दोनों का साहित्य हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने की प्रेरणा देता है। नई पीढ़ी को इन दोनों साहित्यकारों का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। इस दौरान वरिष्ठ कवि रामदेव पाण्डेय, कामेश्वर द्विवेदी ने कहा कि प्रेमचंद भारतीय साहित्य की नैतिक चेतना के शिखर पुरुष हैं। उनका साहित्य समय बदलने पर भी अप्रासंगिक नहीं होता। समारोह में राजेन्द्र पाण्डेय, रविशंकर पाण्डेय, नंदकिशोर सिंह, कृष्णानंद पाण्डेय, जितेन्द्र यादव, सतीश सिंह,संजय सिंह, शशिकांत पाण्डेय, बब्लू यादव, राजकुमार गुप्ता, राजनारायण पाण्डेय मौजूद रहे।
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