जगदीश चंद को आज भी याद है आजादी की पहली सुबह
स्वतंत्रता दिवस की सुबह कई बुजुर्गों को 15 अगस्त 1947 की याद दिलाती है। 94 वर्षीय जगदीश चंद का कहना है कि आजादी की पहली सुबह सभी के मन में थी। उन्होंने और अन्य ने मिलकर जश्न मनाया और एक-दूसरे को बधाई दी। उस दिन की खुशियों और संघर्ष की यादें अब भी ताजा हैं।

चलो फिर आज वह नजारा याद कर लें, शहीदों के दिल में थी वो ज्वाला याद कर लें। जिसमें बहकर आजादी पहुंची थी किनारे पे, देशभक्तों के खून की वो धारा याद कर लें। स्वतंत्रता दिवस का सूर्योदय कई वयोवृद्धों को प्रथम स्वतंत्रता दिवस की वह स्मृतियां ताजा करा देता है। आजादी की पहली किरण अब तक उनके जेहन में जवान है। क्षेत्र के कई बुजुर्गों की ऐसी ही कहानियां हैं। सिंभावली के गांव बक्सर निवासी किसान जगदीश चंद बताते है कि आखिर कैसी थी आजाद भारत की पहली सुबह। करीब 94 वर्ष की आयु पार कर चुके गांव बक्सर निवासी जगदीश चंद ने बताया कि उनकी आयु करीब 14 वर्ष के आस पास होगी, तब 15 अगस्त 1947 की सुबह ही आजादी का समाचार मिला।
हमने एक नई सुबह आजादी की सांस ली, लेकिन साथ में गुलामी के जख्मों का अहसास भी था। यह समझ नहीं आ रहा था कि जिस आजादी को पाने के लिए हिदू और मुसलमान दोनों ने मिलकर संघर्ष किया है, आज वह कैसे अलग अलग हो गए। उस समय मेरठ जनपद पाकिस्तान बंटवारे में हुए दंगों से बहुत दूर था, यहां हंसी खुशी का माहौल था। हिदुस्तान में सभी की आस्था थी। हमें अच्छी तरह याद है कि हम सभी ने बतासे और गुड एक दूसरे को खिलाकर आजादी का जश्न मनाया। हिदू मुस्लिम सभी ने एक दूसरे को आजादी बधाई दी गई।आजादी के लिए हाथों में कभी झंडे तो कभी डंडे लेकर छिपते-छिपाते बैठक होती थी। गली-गली झंडे व डंडे लेकर लोगों को आजादी के लिए जगाते थे।14 अगस्त 1947 की आधी रात को ही आजाद भारत का एलान हो चुका था। बस इंतजार था तो आजादी की पहली सुबह के जश्न का। वह रात भी बेहद कठिन थी। क्योंकि खुशी में उस 14 अगस्त की रात कोई नींद भर सो भी नहीं पाया। सुबह हुई और रेडियो पर आजाद भारत की घोषणा होते ही जश्न का आलम फैल गया। यह निराली सुबह 15 अगस्त सन 1947 की थी। हिन्दुस्तान के आजाद होने के बाद 13 दिन तक गीत गाए गए थे।


