बुद्ध के भिक्षा पात्र को वैशाली लाने का सपना आज भी अधूरा
मनरेगा मैन डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने मजदूरों से होने वाली लूट रोकने के लिए लगवाया था देश का पहला बायोमेट्रिक एटीएम क्षेत्र भ्रमण के दौरान मजदूरों ने रघुवंश बाबू से रोते हुए कहा था कि हुजूर! हम सब का...

वैशाली । प्रभात कुमार भारतीय राजनीति के पुरोधा और मनरेगा मैन के नाम से विख्यात पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वैशाली की मिट्टी और यहां के मजदूरों के दिलों में उनकी यादें आज भी अमिट हैं। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव जिन्हें आदर से ब्रह्मबाबा कहते थे, उन रघुवंश बाबू ने ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए वैशाली के विकास और गरीबों के हक के लिए कई ऐसे ऐतिहासिक कार्य किए, जो आज भी मिसाल बने हुए हैं। स्थानीय मजदूरों से लेकर समाजसेवियों तक, हर कोई आज भी उनकी दूरदर्शिता और सादगी भरे जीवन को याद कर भावुक हो जाता है।
मजदूरों के रूपयों की लूट रोकने को सेंट्रल बैंक में लगवाया था देश का पहला अंगूठा वाला बायोमैट्रिक एटीएम। रघुवंश बाबू के बेहद करीबी सहयोगी रहे चिंतामणीपुर गांव के वरिष्ठ नेता शिवशंकर सिंह उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार क्षेत्र भ्रमण के दौरान मजदूरों ने रघुवंश बाबू से रोते हुए कहा था कि हुजूर! हम सब का मनरेगा का पैसा बिचौलिए खा जाते हैं। मजदूरों का यह दर्द रघुवंश बाबू के दिल को छू गया। उन्होंने तुरंत दिल्ली में उच्च स्तरीय अधिकारियों और बैंक प्रबंधन के साथ बैठक की। इसके बाद भ्रष्टाचार और लूट-खसोट पर लगाम लगाने के लिए वैशाली के सेंट्रल बैंक शाखा में देश का पहला अंगूठा लगाने वाला (बायोमेट्रिक) एटीएम लगवाया। वैशाली के सोहन महतो जैसे बुजुर्ग मनरेगा मजदूर आज भी उन्हें याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं कि उस मशीन के लगने से बड़ी सहूलियत हुई थी, अंगूठा लगाते ही सीधे हाथ में पैसा आ जाता था। स्व. रघुवंश प्रसाद सिंह के भतीजे और वैशाली विकास मंच के संयोजक मुकेश सिंह कहते हैं कि वैशाली गढ़ पर राजकीय समारोह की तरह झंडोत्तोलन की अनूठी परंपरा झारखंड बंटवारे के बाद डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह की यह दिली इच्छा थी कि ऐतिहासिक वैशाली गणराज्य की धरती पर भी पटना और रांची की तर्ज पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर राज्य स्तरीय मुख्य समारोह आयोजित हो, जहां मुख्यमंत्री या राज्यपाल झंडोत्तोलन करें। पटना के साथ वैशाली में भी यह गरिमा दोहराई जाए, इसके लिए उन्होंने सांकेतिक रूप से पांच दलित बेटियों और वरिष्ठ नागरिकों के साथ वैशाली गढ़ पर झंडोत्तोलन की एक नई परंपरा शुरू की थी। उनके जाने के बाद भी यह गौरवमयी परंपरा आज तक कायम है और स्थानीय लोग समय-समय पर इस मांग को लेकर चर्चा करते रहते हैं। बुद्ध अस्थि कलश का सपना हुआ पूरा, लेकिन काबुल से भिक्षा पात्र लाना अब भी बाकी है। कांगेस नेता धर्मवीर शुक्ला, फुलाढ पंचायत के मुखिया अरविंद साह, राजद के वरिष्ठ नेता हरेंद्र राय कहते हैं कि रघुवंश बाबू का एक और बड़ा सपना था कि भगवान बुद्ध का जो भिक्षा पात्र वर्तमान में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में है, उसे भी भारत सरकार के माध्यम से वापस वैशाली मंगाया जाए। वह सपना अधूरा है। अगर भिक्षा पात्र आ जाता, तो यह वैशाली के लिए सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि होती।


