कविता भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, समाज को नई दिशा देने वाली विधा
साहित्यिक चेतना पर समर्पित कार्यक्रम में काव्य-पाठ और संगोष्ठी का आयोजन हुआ। साहित्यकारों ने कविता की सामाजिक भूमिका और मानवीय संवेदनाओं पर विचार साझा किए। कार्यक्रम में डॉ. केपी सिंह ने कविता को समाज को दिशा देने वाली विधा बताया, जबकि आचार्य डॉ. प्रेमीराम मिश्र ने आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की।

साहित्यिक चेतना को समर्पित कार्यक्रम में कविता की वर्तमान समय में प्रासंगिकता विषय पर संगोष्ठी एवं काव्य-पाठ हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े साहित्यकारों ने कविता की सामाजिक भूमिका, मानवीय संवेदनाओं तथा समकालीन संदर्भों पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ रजनी वर्मा ने काव्य-पाठ से किया। सोमेश मिश्रा, डॉ. राजेंद्र सिंह चौहान, अच्युतम केशवम, संजय सिंह, डॉ. ओम ऋषि भारद्वाज, दीप्ति चौहान, दिनेश प्रताप सिंह चौहान, राकेश शम्स, राजेश चंद्र जैन, अभिषेक चौहान तथा अन्य रचनाकारों ने अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर वातावरण को साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया। कविता की प्रासंगिकता विषय पर रामचरितमानस, वेद, पुराणों, गीता के उदाहरण से कविता की सामाजिक उपयोगिता, सांस्कृतिक चेतना तथा मानवीय मूल्यों के संरक्षण में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन रविश कुमार रवि ने किया।कार्यक्रम में डॉ. केपी सिंह ने कहा कि कविता केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाली सशक्त विधा है। अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य में आचार्य डॉ. प्रेमीराम मिश्र ने सभी साहित्यकारों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की।


