हिंदी व भारतीय ज्ञान परम्परा को वैश्विक मंच दे रहे रमाशंकर शुक्ल
संतकबीरनगर के रमाशंकर शुक्ल ने हिंदी भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्हें 32 अंतरराष्ट्रीय और 19 राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। उन्होंने ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण’ का संपादन किया और जल्द ही नई किताबें प्रकाशित करने वाले हैं।
संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले के धनघटा तहसील अंतर्गत मुंडेरा शुक्ल के रहने वाले साहित्यकार, लेखक और शोधकर्ता रमाशंकर शुक्ल हिंदी भाषा, रामकथा और भारतीय ज्ञान परंपरा को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाने में खास भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें अब तक 32 अंतरराष्ट्रीय और 19 राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं, यानी कुल 51 सम्मान मिले हैं।
सम्मान प्राप्ति
रमा शंकर शुक्ल को मॉरीशस के राष्ट्रपति पृथ्वीराज सिंह रूपन और प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ के बुलावे पर स्टेट हाउस ऑफ मॉरीशस और प्रधानमंत्री आवास में सम्मानित किया गया था। इसके अलावा, मॉरीशस के मौजूदा राष्ट्रपति धर्मवीर गोकुल ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय शब्द सारथी सम्मान से भी नवाजा है। भारत में केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी. किशन रेड्डी, पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल, सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत कई बड़े लोगों ने श्री शुक्ल को सम्मानित किया है। विदेशों में हाई कमीशन ऑफ इंडिया लंदन, नेहरू सेंटर लंदन, विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, सुग्रीव यूनिवर्सिटी बाली इंडोनेशिया, फिजी यूनिवर्सिटी, फिजी गिरमिट काउंसिल, महात्मा गांधी संस्थान मॉरीशस और भारतीय काउंसलेट स्कॉटलैंड जैसी कई बड़ी संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मान दिया है।
साहित्यिक योगदान
साहित्य के क्षेत्र में भी रमाशंकर शुक्ल सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। उन्होंने ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण’ के दो खंडों का संपादन किया है, ‘भारत बोध’ किताब लिखी है और ‘शब्द पयोधि’ का संपादन किया है। उनकी आने वाली किताबों में ‘लंदन आई’ और ‘भारतीय संस्कृति का वट-विस्तार’ खास हैं। ये किताबें लंदन, स्कॉटलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया की सांस्कृतिक यात्राओं और भारतीय संस्कृति के वैश्विक असर पर आधारित हैं। आने वाले समय में उनकी दो और किताबें भी छपने वाली हैं। रमाशंकर शुक्ल का मुख्य मकसद भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक चेतना को नई पीढ़ी तक आसानी से पहुंचाना है। वे श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, भगवान श्रीराम के जीवन-दर्शन, हिंदी भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा को युवाओं से जोड़ने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।


