रंग-बिरंगी राखियों से गुलजार हुए रौटा-अमौर के बाजार
बैसा, एक संवाददाता। भाई-बहन के स्नेह का पर्व रक्षाबंधन नजदीक आते ही रौटा बाजार समेत अमौर और ग्रामीण क्षेत्र के हाट-बाजारों में राखियों की दुकानें सज

बैसा, एक संवाददाता। भाई-बहन के स्नेह का पर्व रक्षाबंधन नजदीक आते ही रौटा बाजार समेत अमौर और ग्रामीण क्षेत्र के हाट-बाजारों में राखियों की दुकानें सज गई है। रौटा और अमौर बाजार के अलावा मजगामा, मालोपाड़ा, मीरपुर, बड़ा ईदगाह, मरच्छटा, रमणी, सिरसी, खाड़ी हाट, दुलालगंज और बेलगच्छी समेत अन्य बाजारों में रंग-बिरंगी और आकर्षक राखियां लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बाजारों में छोटी-बड़ी और विभिन्न डिजाइनों की राखियां उपलब्ध हैं। दूसरे शहरों में रहने वाले भाइयों के लिए बहनें अभी से राखियां खरीदकर डाक और कूरियर के माध्यम से भेजने लगी हैं। दुकानदारों के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस बार राखियों की कीमत में करीब पांच से दस रुपये तक का अंतर आया है। इस बार राखियों के डिजाइन में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां बड़ी और भारी राखियों की मांग अधिक रहती थी, वहीं अब हल्की और आकर्षक राखियां लोगों की पसंद बन रही हैं। दुकानदारों के अनुसार एडी नग जड़ी छोटी फैंसी राखियों की मांग सबसे अधिक है। रंगीन एडी नग और आकर्षक डिजाइन वाली राखियां महिलाओं और युवतियों को खास तौर पर पसंद आ रही हैं। बच्चों के लिए बाजार में छोटा भीम, टॉम एंड जेरी, स्पाइडर मैन और टेडी बियर जैसे कार्टून पात्रों वाली राखियां भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा ओम, स्वास्तिक, कृष्ण और गणेश की आकृति वाली राखियां भी बाजार में आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं。
भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व:
रक्षाबंधन के दिन बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। वहीं भाई बहनों को उपहार देने के साथ जीवनभर उनकी रक्षा करने और सुख-दुख में साथ निभाने का संकल्प लेते हैं। यही कारण है कि रक्षाबंधन को भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने वाला पर्व माना जाता है। रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग प्रमुख माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के स्नेह से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया। बाद में महाभारत के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर अपना वचन निभाया। यह कथा भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का प्रतीक मानी जाती है।


