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Pulwama Attack: 'मैं इंतजार करती रही, नहीं आया फोन', पढ़ें शहीद जवानों के परिवार की ऐसी ही कहानियां

लाइव हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीPublished By: Mohan
Sat, 16 Feb 2019 02:15 PM
 जिंदगी के मोर्च पर डटे फौजी परिवार
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जिंदगी के मोर्च पर डटे फौजी परिवार

पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए देवरिया के सीआरपीएफ जवान विजय कुमार मौर्य के साथ ही कई रिश्ते भी शहीद हो गए। कई सपने दम तोड़ गए। बुजुर्ग पिता ने होनहार बेटा खो दिया। पत्नी का सुहाग उजड़ गया। तीन साल की मासूम बच्ची की अभी अपने पापा से पहचान पुख्ता भी नहीं हो सकी थी कि दोनों हमेशा के लिए बिछड़ गए। दो मासूम भतीजियों की उम्मीदों की डोर भी एक झटके में टूट गई। इन सब की जिम्मेदारी आतंकी हमले में शहीद हुए विजय पर थी।

भटनी ब्लॉक के गांव छपिया जयदेव के रहने वाले विजय के घर की माली हालत ठीक नहीं है। उन्होंने हाल में बैंक से 10 लाख रुपये का ऋण लिया था। इससे उन्होंने गोरखपुर में जमीन खरीदी और बाकी पैसों से गांव का घर दुरुस्त कराया था। अब परिवार को चिंता है कि यह लोन कैसे चुकता होगा।

पिता रमायन गांव में ही बटाई ली हुई जमीन पर खेती करते हैं। तीन भाइयों व एक बहन के बीच विजय सबसे छोटे थे। बड़े भाई अशोक गुजरात में निजी कंपनी में काम करते हैं। बहन की शादी हो चुकी है।दूसरे नंबर के भाई हरिओम 2008 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए, लेकिन चार साल पहले उनकी भी मौत हो गई। इसके बाद भाई की पत्नी और दो बेटियां की जिम्मेदारी भी विजय पर थी। वर्ष 2014 में विजय की शादी हुई। उनकी तीन साल की बेटी अराध्या है। विजय के जाने से इन सभी के सपनों ने दम तोड़ दिया।

2015 में भी बाल-बाल बचे थे: पंपोर में वर्ष 2015 में तैनाती के समय भी विजय के वाहन *पर आतंकी हमला हुआ था। तब उन्हें मामूली चोट आई थीं।
पत्नी बोलीं, इतनी शहादतों के बाद भी कुछ नहीं हुआ:विजय की पत्नी विजयालक्ष्मी रात में देवरिया में थीं। गांव पर पिता रामायन को फोन पर बेटे की शहादत की सूचना मिली तो वह पूरी रात बेचैन रहे। सुबह हमले की जानकारी मिलने के बाद से विजयालक्ष्मी सुध-बुध खो बैठी हैं। पूछने पर विजयालक्ष्मी रोते-रोते सवाल करती हैं, आज तक इतने जवान शहीद हुए,क्या हुआ? कुछ भी नहीं। नेता हो या मंत्री, कोई कुछ नहीं करता। बस चार दिन शोर होगा, उसके बाद सब शांत हो जाता है, लेकिन हम पर तो जिंदगीभर गुजरती है। 

मैं इंतजार करती रही, नहीं आया फोन
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मैं इंतजार करती रही, नहीं आया फोन

रमेश इसी मंगलवार को छुट्टी पूरी कर डयूटी के लिये श्रीनगर के लिए रवाना हुए थे। उन्हें पुलवामा जाना था। मैंने पूछा, दोबारा कब आओगे। बोले, चिंता मत करो एक महीने बाद फिर आऊंगा। बुधवार रात को वहां पहुंचने के बाद मुझे फोन किया। घर में सबकी सलामती पूछकर फोन रख दिया।

फिर गुरुवार को दोपहर एक बजे फिर उनका फोन आया। बोले, बस में बैठने जा रहा हूं। फिर बेटे आयुष से बात कराने को कहा। आयुष खेल में मगन था। उसने बात नहीं की तो बोले, अच्छा कोई बात नहीं। शाम को फोन करुंगा। मैं इंतजार करती रही। रात आठ बजे फोन की घंटी बजी। मुझे लगा उनका फोन होगा। मैंने दौडकर फोन उठाया। उधर से किसी ने पूछा, आप कौन हैं। मैंने कहा, मैं रमेश यादव की पत्नी हूं। उधर से आवाज आई, आपके पति शहीद हो गए। मेरी तो जान ही निकल गई। ये क्या हुआ। वो तो मुझसे फोन करने वाले थे। मुझसे बिना बात किये ही चले गये। ये कैसे हो सकता है। यकीन नहीं होता, रमेश हमें छोडकर चले गये हैं।

शहीद रमेश यादव की पत्नी रेनू कहती हैं, जिन्होंने हमारे पति को मारा है, उन लोगों को मुंहतोड़ जवाब मिलना चाहिये। ऐसा करारा जवाब कि फिर किसी का सुहाग उजाड़ने से पहले वे दस बार सोचें।

 दो बहू, तीन बेटियों की जिम्मेदारी कैसे संभालू
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दो बहू, तीन बेटियों की जिम्मेदारी कैसे संभालू

शहीद विजय के पिता रमायन मौर्य कहते हैं कि अभी तक घर में एक विधवा व बिना पिता की दो बेटियां थीं। विजय उन्हें संभालता था। अब तो दो बहू विधवा हो गईं और तीन मासूम बेटियां हैं। उम्र के इस पड़ाव में मैं कैसे इनका सहारा बन पाऊंगा। इतना कहकर रमायन फफक-फफककर रो पड़ते हैं। वह बताते हैं कि विजय बचपन से ही मिलनसार व हंसमुख था। प्राथमिक शिक्षा गांव से पूरी करने के बाद विजय ने सुभाष इंटर कालेज भटनी से 1998 में हाईस्कूल व 2000 में इंटर की पढ़ाई की। 2004 में बीए जिला मुख्यालय के संत विनोबा पीजी कॉलेज से किया। एमए मदनमोहन मालवीय पीजी कॉलेज से 2007 में किया। पूरी पढ़ाई उसने गांव से ही आ-जाकर की। इस बीच वह गांव के पास के मैदान में भर्ती की तैयारी भी करता रहा। तैयारी के समय भी अपने साथ के युवाओं में उसकी अच्छी पहचान थी। नौकरी में आने के बाद गांव आने पर उस तेंदुआ कुटी के मैदान पर जरूर जाता था, जहां उसने तैयारी की थी।

  अब किसी सैनिक की पत्नी का सुहाग न छिने
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अब किसी सैनिक की पत्नी का सुहाग न छिने

पुलवामा में आतंकी हमले से वर्ष 2013 में शहीद हुए लांस नायक हेमराज सिंह के परिवारों वालों के जख्म एक बार फिर ताजा हो गए। पति को खोने का दर्द सहने वाली शहीद की पत्नी धर्मवती ने मांग की है कि सरकार सख्त से सख्त कार्रवाई करे ताकि भविष्य में महिलाओं का सुहाग और बच्चों के सिर से पिता का साया न छिने।

मालूम हो कि 8 जनवरी, 2013 को मथुरा के हेमराज सिंह और एक अन्य जवान लांस नायक सुधाकर सिंह की पाकिस्तानी सैनिकों ने घात लगाकर बर्बरता से हत्या कर दी थी। पाकिस्तानी सैनिक हेमराज का सिर काटकर ले गए थे, जिसके चलते उनके परिवार को हेमराज का चेहरा देखना तक नसीब नहीं हो सका था।

शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती कहती हैं कि यह बर्दाश्त करने लायक नहीं है। सरकार चाहे कुछ भी करे, लेकिन किसी सैनिक की पत्नी अब विधवा नहीं होनी चाहिए। जैसा मेरे और अन्य जवानों की पत्नियों के साथ हुआ है, वो दिन किसी और सैनिक की पत्नी को न देखना पड़े।

हेमराज के भाई जयवीर कहते हैं कि भाई हेमराज की शहादत को 6 साल बीत चुके हैं, लेकिन परिवार मदद के लिए दर-दर भटक रहा है। न तो किसी को सरकारी नौकरी मिली न ही पेट्रोल पंप। परिवार को आज भी हर बात के लिए दूसरे का सहारा लेना होता है।

राजस्थान राइफल्स में थे हेमराज और सुधाकर : शहीद हेमराज और सुधाकर दोनों जम्मू सीमा पर 13 राजस्थान राइफल्स में लांसनायक के पद पर तैनात थे। वर्ष 2015 में जब भारतीय जवानों ने हेमराज के हत्यारे को मार गिराया तब उनकी पत्नी धर्मवती ने उसका सिर काटकर उन्हें सौंपने की मांग की थी।

 सीमा पर पति और घर में पत्नी संभाल रहीं मोर्चा
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सीमा पर पति और घर में पत्नी संभाल रहीं मोर्चा

जब भी किसी आतंकी हमले की खबर आती हैतो पठानकोटमें तैनात सोनल सिंह का पूरा परिवार सारी रात सो नहीं पाता। सोनल की पत्नी मधु कहती हैं कि दिन में परिवार के सदस्य कई बार फोन कर उनका हाल पूछते हैं। जिस दिन डयूटी पर होने की वजह से बात नहीं होती, वह दिन मुश्किलों से कटता है।

चित्रकूट जिले के गांव सरधुवा निवासी मधु सिंह बताती हैं, दिन तो घरेलू काम व सास-ससुर की सेवा में कट जाता है पर शाम होने पर पति की चिंता सताने लगती है। जब भी हमले की खबर आती है तो मन बेचैन हो उठता है। पिछले 15 साल से पल-पल बेचैनी के आलम में जिंदगी गुजर रही है।

मधु कहती हैं कि घात लगाकर हमला करने वालों से एक बार आर-पार की लड़ाई हो जानी चाहिए। उनकी दोनों बेटियां भी फौज में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहती हैं।

बेटे के साथ सारी खुशियां भी चलीं गईं
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बेटे के साथ सारी खुशियां भी चलीं गईं

जब भी सीमा पर तनाव की खबरें आती हैं, तो कारगिल में अपने बेटे को खोने वाली इस बूढ़ी मां का कलेजा कांप उठता है, दिल में छिपा दर्द आंखों से बह उठता है। देहरादून के गढ़ी कैंट में रहने वाली 74 वर्षीय पदमा का बेटा 20 साल पहले शहीद हुआ था, जिसके बाद उनका परिवार बिखर गया और आज वह नितांत अकेली रह गईं।

कारगिल के बाद ऑपरेशन रक्षक के दौरान कश्मीर में आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए थर्ड फोर गोरखा रेजीमेंट के रायफलमैन 29 वर्षीय कृतज्ञ राना शहीद हो गए थे। शहीद राना की बूढ़ी मां से जब बेटे की बात की, शब्द से पहले आंसू छलक गए।

खुद को संभालते हुए पदमा ने कहा कि जब कृतज्ञ सेना में भर्ती हुआ, तब सबसे ज्यादा मैं खुश हुई थी। उस समय लगा था कि अब सुख के दिन आ गए हैं, लेकिन *इस आतंकवाद ने मुझसे मेरा बेटा, मेरी खुशी और *मेरा पूरा परिवार ही छीन लिया। मेरा लाल मातृभूमि पर *न्यौछावर हो गया, उसी के साथ घर की सारी खुशियां *चली गईं।

पोता केवल 12 दिन का था और बेटा चला *गया : जब बेटा शहीद हुआ, तब पोता 12 दिन का था। कृतज्ञ अपने बेटे को देखने और अपनी शादी की पहली सालगिरह मनाने के लिए छुट्टी पर आने वाला था, लेकिन आज तक नहीं लौटा। बेटे के शहीद होने के छह महीने बाद ही बहू पोते को लेकर बिना बताए मायके चली गई और फिर कभी नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद पति कुंवर सिंह राना का भी निधन हो गया। सरकार से जो भी मदद मिली, वो सब बहू के नाम थी। खैर उस सबकी इतनी जरूरत नहीं है, लेकिन कृतज्ञ की निशानी उसका बेटा साथ रहता, तो उसे सीने से लगा, थोड़ा गम हल्का हो जाता।

पदमा कहती हैं कि छोटा बेटा भी अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहता है। उम्र के ढलते पड़ाव पर अकेलापन इस कदर हावी हो गया है, जिसके चलते आजकल स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है। पदमा अब देहरादून में अकेली ही रहती हैं।.

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