पद्मश्री रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व जल तत्व की तरह सहज-निर्मल था : प्रो. विश्वनाथ तिवारी
गोरखपुर में साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने पद्मश्री रामदरश मिश्र की 103वीं जयंती पर कहा कि उनका व्यक्तित्व जल तत्व के समान था। संगोष्ठी में उनके साहित्य की गहराई, सहजता और सामाजिक प्रासंगिकता पर चर्चा की गई। इस अवसर पर कई युवा साहित्यकारों को भी सम्मानित किया गया।
गोरखपुर, राजीव दत्त पाण्डेय। साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं पद्मश्री प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि पद्मश्री डॉ. रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व सांख्य दर्शन के पंचमहाभूतों में से ‘जल तत्व’ के समान था। जल रहस्यमय और आकर्षक होने के साथ-साथ सहज, सरल और जीवनदायी होता है। रामदरश मिश्र का जीवन और साहित्य भी इसी जल तत्व की तरह स्वाभाविक, निर्मल और आत्मीय रहा।
रामदरश मिश्र की 103वीं जयंती
प्रोफेसर तिवारी, शुक्रवार को पद्मश्री रामदरश मिश्र की 103वीं जयंती की पूर्व संध्या पर रामदरश मिश्र न्यास, भारतीय हिन्दी प्राध्यापक परिषद एवं अखिल भारतीय भाग्य महाविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में रानापार में आयोजित ‘रामदरश मिश्र के साहित्य में जल, जवार और जीवन के प्रश्न’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रो. मिश्र बीती और वर्तमान दोनों शताब्दियों के साक्षी रचनाकार थे। उनके सृजन का कालखंड हिंदी साहित्य के लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आंदोलनों का साक्षी रहा। उन्होंने इन आंदोलनों को न केवल देखा-समझा, बल्कि उनकी अंतर्वस्तु और प्रभाव को भी आत्मसात किया, किंतु किसी आंदोलन के ‘दलदल’ में स्वयं को नहीं फंसने दिया। उन्होंने अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता और स्वभाव के अनुरूप साहित्य का सृजन किया। रामदरश मिश्र का साहित्य किसी विचारधारा या आंदोलन की सीमाओं में बंधा साहित्य नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य के अनुभवों से उपजा व्यापक रचनात्मक संसार है। यही कारण है कि उनकी रचनाएं समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाती हैं।
रामदरश मिश्र का समर्पण
प्रोफेसर तिवारी ने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि हमें लंबे समय तक रामदरश मिश्र का सान्निध्य और सहचर्य प्राप्त हुआ। उनके व्यक्तित्व में जितनी सहजता और आत्मीयता थी, उनकी रचनाओं में भी उतनी ही गहरी जीवनानुभूति दिखाई देती है। उन्होंने अपने साहित्य में जल, जवार और जीवन का अत्यंत आत्मीय, संवेदनशील और जीवंत चित्रण किया है। उनकी रचनाओं में लोकजीवन की मिट्टी की गंध, प्रकृति की लय और मनुष्य के संघर्ष एवं संवेदना का सहज स्पंदन मिलता है।
रामदरश मिश्र के जीवन और लेखन में किसी तरह की चेष्टा नहीं : डॉ रामदेव शुक्ल
साहित्यकारों के विचार
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि साहित्यकार डॉ. रामदेव शुक्ल ने पद्मश्री रामदरश मिश्र और उनके शुरुआती काव्य गुरु मनीषी साहित्यकार पंडित गणेशदत्त मिश्र 'मदनेश' के संस्मरण सुनाए। कहा कि मदनेश जी ने किशोरावस्था में रामदरश मिश्र को छंद, रस और अलंकार की शुरुआती शिक्षा व प्रेरणा दी थी। राप्ती एवं गोर्रा नदियों के संधि स्थल पर दोनों ही साहित्यकारों का जन्मस्थल है। उन्होंने रामदरश मिश्र के ग्राम डूमरी का अर्थ भी बताया कि यह डूमरी गूलर का फूल है। उन्होंने रामदरश मिश्र की बिटिया डॉ. स्मिता मिश्र के जन्मदिन पर उनकी लिखी कविता का जिक्र करते हुए कहा कि आज स्मिता का पराक्रम है कि वे अपने पिता के जन्मदिन पर इतना बड़ा आयोजन कर रही हैं, पूछा कि ऐसा करने के लिए कितने पुत्र होने चाहिए? उन्होंने कहा कि रामदरश मिश्र के जीवन और लेखन में किसी तरह की चेष्टा नहीं है, बल्कि सहजता है, जिसे उनकी रचनाओं में सहज ही दिखता है।
संस्कृति की पहचान
डॉ. मिश्र, प्रेमचंद-रेणु की मिलीजुली परम्परा के लेखक: डॉ चितरंजन मिश्र
साहित्यकार डॉ. चितरंजन मिश्रा ने कहा कि रामदरश मिश्र, प्रेमचंद और रेणु की मिलीजुली परम्परा के लेखक हैं। अपने लेखन में रामदरश मिश्र दोनों को ही चरितार्थ करते हैं। उन्होने मंच पर उपस्थित प्रोफेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के विचार को स्मरण कराया जिसमें उन्होने रामदरश मिश्र के लिए कहा था कि प्रेमचंद कलम के सिपाही थे तो रामदरश जी कलम के मजदूर हैं। उन्होंने जीवन भर साहित्य की सभी विधाओं में सृजन किया, उनका सृजन में गांधी और लोहिया की आधुनिकता दिखती है जो सहज, ठेठ और खाटी आधुनिकतावादी है। वे अपने पुराने मूल्यों को छोड़े बिना नए मूल्यों को सहज ग्रहण करने को तैयार हैं।
डूमरी का महत्व
मिश्र जी के साहित्यकार का मोर जंगल में नहीं डूमरी में नाचता रहा
साहित्यकार डॉ. वेद प्रकाश पाण्डेय ने कहा कि रामदरश मिश्र के साहित्य में डूमरी छाया हुआ था। वे डूमरी से बनारस, गुजरात और दिल्ली गए लेकिन डूमरी में ही धंसे हुए थे। उनके साहित्य सृजन का मोर जंगल में नहीं बल्कि अपने गांव में नाच रहा था। कवि डॉ. ओम निश्चल ने कहा कि उन्होंने 1947 से लिखना शुरू किया, लगभग सात दशक में शायद ही कोई विधा मिश्र जी से छूटी हो लेकिन सभी विधाओं में उनका जल, जवार और जीवन के निकट ही रहे। केंद्रीय विश्वविद्यालय से आए प्रोफेसर संजीव कुमार दुबे ने कहा कि बम्बई विश्वविद्यालय में डूमरी से निकले साहित्यकार का उपान्यास ‘जल टूटता हुआ’ पढ़ाया जाता रहा जिसमें हम कछार की जिजीविषा पढ़ रहे थे।
उनका साहित्य आज भी सामयिक है।
स्मृति साझा
लगता है कि पिता की अंतिम इच्छा पूर्ण हुई: प्रोफेसर स्मिता मिश्रा
रामदरश मिश्र न्यास की सचिव प्रोफेसर स्मिता मिश्र ने अपने पिता से जुड़ी स्मृतियां साझा की। कहा कि उनकी ग्राम चेतना और कालजयी रचनाओं को वैश्विक डिजिटल स्मृति के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए न्यास का गठन किया। स्वास्थ्य कारणों से वे इच्छा रहते हुए यहां नहीं आ पाए। 103 साल पहले इसी गांव की पगडंड़ी से निकल राप्ती-गोर्रा नदियों को पार कर बनारस, फिर अहमदाबाद और दिल्ली पहुंचे। यहां डूमरी के पास रानापार में कार्यक्रम कर ऐसा लग रहा है कि पिता की अंतिम इच्छा पूर्ण हो गई।
छात्राओं का सम्मान
दुर्गावती रामनाथ शिक्षा चिकित्सा न्यास से छात्राएं हुई सम्मानित
अतिथियों ने दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के हाथों सम्मानित अखिलभाग्य महाविद्यालय रानापार की चार छात्राओं निधि यादव, आरती यादव, रोशनी गुप्ता और प्रियंका विश्वकर्मा को दुर्गावती रामनाथ शिक्षा चिकित्सा न्यास की ओर से 2100-2100 रुपये का नगद राशि एवं सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान प्रो संजीव कुमार दुबे ने बताया छात्राओं ने विश्वविद्यालय में अलग-अलग विषयों में सर्वोच्च अंक प्राप्त किया है।
पुस्तकों का लोकार्पण
चार पुस्तकों का हुआ लोकार्पण
राष्ट्रीय संगोष्ठी में मंचासीन अतिथियों ने रामदरश मिश्र न्यास से प्रकाशित चार पुस्तकों का लोकार्पण किया। इनमें पथ के गीत(प्रथम कविता संग्रह), बाजार को निकले हैं लोग (प्रथम गजल संग्रह), अक्षर अक्षर रामदरश- कालजयी मनीषी (अलका सिन्हा), रामदरश मिश्र समन्यक पुर्नवलोकन।
युवाओं का सम्मान
ये युवा साहित्यकार हुए सम्मानित
राष्ट्रीय संगोष्ठी में रामदरश मिश्र शताब्दी सृजन सम्मान से युवा कवि उत्कर्ष अग्निहोत्री और युवा आलोचक कृष्ण विहारी पाठक को मंचासीन अतिथियों ने सम्मानित किया। संगोष्ठी के पूर्व रामदरश मिश्र स्मृति पुस्तकालय का अतिथियों ने फीता काट कर उद्घाटन किया। संगोष्ठी में महाविद्यालय के प्रबंधक डॉ सुधीर कुमार राय, प्राचार्य डॉ रागिनी राय ने क्रमश स्वागत और आभार ज्ञापन किया। संचालन डॉ गौरव तिवारी ने किया। इस दौरान प्रो. राम दरश राय, प्रो. अनिल राय, प्रो दीपक प्रकाश त्यागी, हरिशंकर राठी, डॉ अखिल मिश्र, डॉ हरिलाल, डॉ वेदामित्र शुक्ल, प्रो विमलेश मिश्र, अलका मिश्र सिन्हा, शशिबिंदु नारायण मिश्र, प्रो जसवीर त्यागी, मनोज कुमार सिन्हा, डॉ अंजली तिवारी, डॉ अश्वनी कुमार तिवारी, केपी सिंह समेत अन्य उपस्थित रहे।


