भाजपा के लिए तीन उपचुनाव के नतीजों की तासीर काफी अहम
तीन राज्यों में विधानसभा की उपचुनाव के नतीजों को लेकर भाजपा के लिए काफी चिंता उत्पन्न हुई है। बिहार में बांकीपुर की सीट गंवाने से भाजपा की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। मध्य प्रदेश में दतिया सीट पर कांग्रेस की जीत हुई है, जबकि गुजरात में भाजपा का दबदबा बना रहा, लेकिन जीत का अंतर घट गया।

तीन राज्यों में विधानसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव के नतीजों से भले ही किसी राज्य की सरकार पर ज्यादा असर नहीं पड़ा, लेकिन नतीजों की राजनीतिक तासीर काफी अहम है। खासकर भाजपा के लिए जिसने बिहार में तीन दशक तक गढ़ रही और राष्ट्रीय अध्यक्ष की खाली हुई बांकीपुर सीट गंवा दी। मध्य प्रदेश में आपसी कलह से विवाद में रही दतिया सीट पर फिर कांग्रेस को जीत मिली। वहीं गुजरात में मांजलपुर सीट पर भाजपा का दबदबा बरकरार रहा लेकिन जीत का अंतर घट गया। विपक्ष के लिए नतीजे भले ज्यादा उत्साहित करने वाले न हों, लेकिन उसे भी जनता ने भावी राजनीति के लिए संकेत दे दिए हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा ने पहले कभी महत्वपूर्ण उपचुनाव न हारे हों। वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की खाली हुई गोरखपुर लोकसभा सीट और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की खाली हुई फूलपुर लोकसभा सीट पर भाजपा को सपा से हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए इन उपचुनावों में हार कोई बड़ा संकट नहीं है, लेकिन संगठन और सरकार, नेतृत्व के फैसलों, संवाद और तौर तरीकों के लिए संकेत जरूर बड़े हैं। चूंकि देश में इस समय माहौल बदला हुआ है। इसलिए इन उपचुनावों की चिंगारी को भाजपा और नहीं बढ़ने देना चाहेगी。
टिकटों से चर्चित रही बांकीपुर व दतिया
देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल में तीन उपचुनाव में ज्यादा नजर दो उपचुनावों बांकीपुर व दतिया पर थी। बांकीपुर की सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा के चुने जाने से रिक्त हुई थी, जो मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस विधायक को सजा मिलने के कारण अयोग्य घोषित करने के कारण उपचुनाव हुआ था। बांकीपुर में जनसुराज के नेता प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में आने से बेहद चर्चित हो गया था और दतिया मध्य प्रदेश भाजपा के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलने और उनके समर्थकों के भारी हंगामे से चर्चा में रहा। दोनों जगह स्थितियां भले ही एकदम अलग हों, लेकिन भाजपा को दोनों जगह हार मिली।
सरकारों ने बनाया था प्रतिष्ठा का सवाल
चूंकि बिहार व मध्य प्रदेश दोनों जगह भाजपा की सरकारें है और दोनों सरकारों ने इन दोनों उपचुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल भी बनाया हुआ था। बांकीपुर तो ऐसा गढ़ थी जहां भाजपा को तीस साल लगातार जीत मिली थी। चूंकि यह सीट भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की थी, इसलिए इससे भाजपा संगठन व सरकार दोनों की प्रतिष्ठा भी जुड़ी थी। भाजपा यहां पर जीत के बजाए अंतर की बात करती रही थी, लेकिन प्रशांत किशोर के मैदान में आने और भाजपा के उम्मीदवार तय होने के विवाद के कारण हालत बदलते दिखे। भाजपा ने अपने पहले घोषित उम्मीदवार को नामांकन के बाद बदल दिया। दोनों ही स्थानीय स्तर के कार्यकर्ता रहे।
नतीजों ने चौंकाया ही नहीं, चिंतित भी किया
पूरे क्षेत्र में यह चर्चा रही कि भाजपा जिसे भी टिकट दे देगी वह जीत जाएगा, दूसरी तरफ राजद भी चुनाव मैदान में थी। यानी मुकाबला त्रिकोणीय था, भाजपा नेतृत्व जीत के लिए पूरी तरह आश्वस्त था, जबकि नीचे से यह संकेत आ रहे थे कि कार्यकर्ताओं व समर्थक वर्ग में नाराजगी है। इसलिए राज्य सरकार व पार्टी ने पूरी ताकत भी झोंकी। बावजूद इसके भाजपा हारी ही नहीं, उसका वोट प्रतिशत लगभग आधा कम हो गया। ऐसे में नतीजे ने चौंकाया ही नहीं चिंतित भी किया।
दतिया में आपसी कलह हावी
दतिया में भी पूरी सरकार जुटी रही, जबाब में कांग्रेस ने भी मैदान संभाल लिया, लेकिन टिकट कटने से नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी और आजाद समाज पार्टी (कांसीराम) के उम्मीदवार की मजबूत उपस्थिति ने कांग्रेस को जिताकर भाजपा को झटका दिया। यहां पर भाजपा की चुनाव प्रबंधन टीम पर पहले से ही सवाल खड़े हुए थे और नतीजों के बाद वह बढ़े हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल को ढाई साल हो गए हैं। प्रदेश के तमाम बड़े नेताओं के बजाए नेतृत्व ने मोहन यादव को राज्य की कमान सौंपी थी। उनके लिए यह बड़ा चुनाव था। क्षेत्र के समीकरणों को समझने व नेताओं को साथ रखने की कमी यहां पर साफ नजर आ रही थी। संगठन भी बंटा दिख रहा था। पार्टी नेताओं का अनौपचारिक तौर पर मानना है कि वहां पर आपसी कलह की कीमत चुकानी पड़ी है।
बांकीपुर में अतिआत्मविश्वास से नुकसान
बिहार में इस समय नए समीकरण थे। जदयू के नीतीश कुमार की जगह सम्राट चौधरी भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं। वह भी सामाजिक समीकरणों के तहत चुने गए थे। हालांकि वह भाजपा के मूल काडर के नहीं है। राज्य में देश के अन्य हिस्सों की तरह छात्रों के आंदोलन को लेकर एक माहौल है। उसमें भी भाजपा का अति आत्मविश्वास भी यहां पर साफ दिख रहा था।


