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अकेले नहीं चिराग, ठाकरे से अखिलेश तक पहले भी चाचा-भतीजों में हुआ है टकराव

लाइव हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीPublished By: Priyanka
Tue, 15 Jun 2021 11:44 AM
अकेले नहीं चिराग, ठाकरे से अखिलेश तक पहले भी चाचा-भतीजों में हुआ है टकराव

बिहार की राजनीति में एक बार फिर से सियासी उठापटक देखने को मिली है। हालांकि, इस बार यह मामला एक पार्टी विशेष का है, यानी लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी का। पार्टी के 5 सांसदों ने अपने मुखिया चिराग पासवान के खिलाफ बगावत कर दी और उनके चाचा पशुपति पारस को अपना नया नेता चुन लिया। माना जा रहा है कि इस बगावत की शुरुआत किसी और ने नहीं बल्कि चाचा पशुपति पारस ने ही की थी। हालांकि, यह पहली बार नहीं जब राजनीति में चाचा-भतीजे के बीच रार देखने को मिली हो। इससे पहले भी भारत की राजनीति में कई मौके आए जब चाचा-भतीजों के बीच सांप-सीढ़ी का खेल खेला गया। आइए आपको बताते हैं ऐसी ही कहानियां: 

पशुपति पारस और चिराग पासवान
एलजेपी के छह में से पांच लोकसभा सांसदों ने चाचा पशुपति पारस को संसदीय दल का नेता चुन लिया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने उन्हें पार्टी के संसदीयल दल के नेता के तौर पर मान्यता भी दे दी है। इसका मतलब है कि अब चिराग पासवान की एलजेपी संसदीय दल के नेता के तौर पर मान्यता खत्म हो गई। दरअसल, राम विलास पासवन के निधन के बाद एलजेपी की कमान चिराग पासवान के हाथ आ गई और वह पार्टी से जुड़े सभी फैसले लेने लगे। यही बात पार्टी के बाकी नेताओं को पसंद नहीं आ रही थी। बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए से अलग लड़ने का फैसला भी चिराग का ही माना जाता है, जहां एलजेपी को बड़ी हार देखनी पड़ी थी।

शरद पवार-अजित पवार
चाचा-भतीजे के बीच सियासी गणित बिगाड़ने के खेल का सबसे ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में ही देखने को मिला था। साल 2019 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद रातोंरात भतीजे अजित पवार ने बीजेपी के साथ मिलकर शपथ ले ली थी और चाचा शरद पवार को इसकी भनक तक नहीं लगी।  सुबह-सुबह पौने छह बजे राष्ट्रपति ने राज्य से शासन हटाया और आठ बजे देवेंद्र फडणवीस ने सीएम पद की शपथ ली और अजित पवार ने डिप्टी सीएम पद की। इसके बाद शरद पवार ने कहा कि अजित पवार का बीजेपी के साथ जाना उनका फैसला है। हालांकि, बहुमत न होने के कारण देवेंद्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया और फिर एनसीपी ने कांग्रेस-शिवसेना के साथ मिलकर सरकार महा विकास अघाड़ी सरकार बनाई। अजित पवार भी लौटकर आए और अब वह राज्य के डिप्टी सीएम हैं।

बाला साहेब और राज ठाकरे
बाल ठाकरे मुंबई के बेताज बादशाह थे। लेकिन शुरुआत में उनके बेटे यानी उद्धव ठाकरे राजनीति में बहुत दिलचस्पी नहीं लेते थे। उनके भतीजे राज ने शिवसेना का काम करना शुरू किया। ऐसा समय आया जब राज ठाकरे को बाल ठाकरे की कार्बन कॉपी कहा जाने लगा। उन्होंने विद्यार्थी सेना बनाई। हालांकि, बाला साहेब ने अपनी राजनीतिक विरासत बेटे उद्धव को सौंप दी। इसके बाद राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ कर अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली। पार्टी बनाने के पीछे एक वजह यह भी दी जाती है कि उस वक्त यानी साल 2006 में उद्धव के साथ राज ठाकरे के मतभेद ज्यादा गहरा गए थे और शिवसेना के टिकट बंटवारे में भी दोनों आमने-सामने आ गए थे। 

शिवपाल-अखिलेश यादव 
उत्तर प्रदेश में भी चाचा-भतीजे की इस लड़ाई ने समाजवादी पार्टी को काफी नुकसान कराया। शुरुआत हुई साल 2012 विधानसभा चुनावों से, जब मुलायम सिंह यादव ने भाई शिवपाल की जगह अपने बेटे अखिलेश यादव को पार्टी का चेहरा बनाया। इसके बाद अखिलेश यादव का चाचा शिवपाल यादव से टकराव शुरू हो गया। साल 2017 में तल्खियां इस कदर बढ़ीं की भतीजे अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। चाचा शिवपाल ने अपनी अलग पार्टी तक बना ली, जिसका नाम प्रगतिशील समाजवादी पार्टी रखा गया।

प्रकाश बादल और मनप्रीत बादल
पंजाब में चाचा प्रकाश सिंह बादल ने भी अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल का राजनीतिक करियर बनाया। हालांकि, यह भतीजे मनप्रीत को रास नहीं आया और उन्होंने बगावत कर पंजाब पीपल्स पार्टी बना ली। साल 2016 में भतीजे मनप्रीत ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया था।

अभय और दुष्यंत चौटाला
हरियाणा की राजनीति में चौटाला परिवार का अपना रुतबा रहा है। ओमप्रकाश चौटाला और उनके दो बेटे अभय-अजय चौटाला। शिक्षक भर्ती घोटाला में पिता ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला को जेल की सजा हुई तो छोटे भाई अभय चौटाला ने खुद को सीएम पद का दावेदान मानना शुरू कर दिया। हालांकि, भतीजे दुष्यंत चौटाला ने उनका यह सपना चूर-चूर कर दिया। दुष्यंत ने अलग पार्टी बना ली जिसका नाम जननायक जनता पार्टी रखा और वह आज हरियाणा की बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार में डिप्टी सीएम हैं।

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